स्वतंत्रता (Liberty) की परिभाषा, इसायाह बर्लिन, जॉन स्टुअर्ट मिल, जॉन लॉक एवं भारतीय दार्शनिकों के विचार, स्वतंत्रता के प्रकार, नकारात्मक व सकारात्मक स्वतंत्रता तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19–22 का विस्तृत अध्ययन।


स्वतंत्रता (Liberty) की परिभाषा, इसायाह बर्लिन, जॉन स्टुअर्ट मिल, जॉन लॉक एवं भारतीय दार्शनिकों के विचार, स्वतंत्रता के प्रकार, नकारात्मक व सकारात्मक स्वतंत्रता तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19–22 का विस्तृत अध्ययन। 




🔹स्वतंत्रता (Liberty) क्या है ? स्वतंत्रता की परिभाषा ।

🔹स्वतंत्रता पर इसायाह बर्लिन का विचार

(Isiyah barlin on Liberty) 

🔹स्वतंत्रता पर जॉन स्टुअर्ट मिल के विचार 

(J S Mill on Liberty)

🔹स्वतंत्रता पर जॉन लॉक के विचार

🔹स्वतंत्रता पर भारतीय दार्शनिकों के विचार 

🔹स्वतंत्रता के प्रकार  (Types Of Liberty in Political science) 

 (i) राजनीतिक स्वतंत्रता (Political Liberty)

(ii) नागरिक स्वतंत्रता ( Civil Liberty)

(iii) व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty)

(iv) आर्थिक स्वतंत्रता (Economic Liberty) 

(v) सामाजिक स्वतंत्रता (Social Liberty)

(vi) नैसर्गिक (प्राकृतिक) स्वतंत्रता ।

🔹नकारात्मक व सकारात्मक स्वतंत्रता 

(Negative Liberty and Positive Liberty)

🔹भारतीय संविधान में स्वतंत्रता का अधिकार(अनुच्छेद 19-22) । 


स्वतंत्रता (Liberty) क्या है ? स्वतंत्रता की परिभाषा : 


स्वतंत्रता लैटिन शब्द लिबर (Liber) से बना है । इसका अर्थ है बाहरी प्रतिबंधों, बंधनों या बाधाओं से मुक्ति। यह अपनी इच्छा के अनुसार सोचने, कार्य करने और अपना विकास करने की शक्ति है, लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि हम अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग दूसरों के अधिकारों का हनन किए बिना करें।   

     स्वतंत्रता की अवधारणा का विकास मध्य युग में हुआ । 15वीं व 16वीं सदी में स्वतंत्रता का तात्पर्य राजतंत्र के खिलाफ स्वतंत्रता थी। अर्थात राजा लोगों के जीवन और विचारों को पूर्णतः नियंत्रित नहीं कर सकता।  17वीं सदी के बाद स्वतंत्रता सरकार के विरोध में प्रकट हुई।  ऐसा माना गया कि बहुमत तथा सरकार लोगो के विचारों को नियंत्रित नहीं कर सकते। विचार व तर्क करने की शक्ति लोगो में अंतर्निहित है । 

  🔹 सीले के अनुसार, स्वतंत्रता अतिशासन का विलोम है । 

🔹 मैक्केन के अनुसार , स्वतंत्रता सभी प्रतिबंधों का अभाव नहीं बल्कि अतार्किक प्रतिबंधों का अभाव है । 

🔹 जे. एस. मिल के अनुसार , स्वतंत्रता प्रतिबंधों का अभाव है ,उनके अनुसार हर प्रतिबंध दोष है, लोगों को नियंत्रित करने से बेहतर उन्हें अपनी इच्छा पर छोड़ देना चाहिए । 


स्वतंत्रता पर दार्शनिकों के विचार


स्वतंत्रता पर इसायाह बर्लिन का विचार

(Isiyah barlin on Liberty) : 


बर्लिन ने स्वतंत्रता की दो मुख्य अवधारणाओं  नकारात्मक और सकारात्मक स्वतंत्रता  को प्रस्तुत किया और उनके बीच एक उपयोगी अंतर बताया। उनका विचार उनकी प्रसिद्ध रचना“Two Concepts of Liberty” (1958) में मिलता है।

🔹बर्लिन के अनुसार , बाहरी बाधाओं का अभाव, यानी जहाँ किसी व्यक्ति पर कोई बंधन न हो , ही स्वतंत्रता है। 

  बर्लिन के अनुसार ,सकारात्मक स्वतंत्रता को आत्म-नियंत्रण और आत्म-विकास के लिए आवश्यक शक्तियों के रूप में देखा जाता है,जोकि त्रुटिपूर्ण है । उनके अनुसार  इसके परिणामस्वरूप ही पितृसत्तात्मक व्यवस्था का जन्म होता है । 

🔹उनके अनुसार, सकारात्मक स्वतंत्रता की संकल्पना में सामाजिक आत्मनियंत्रण का विस्तार हो जाता है , जिसके अनुसार राज्य का हस्तक्षेप व्यक्ति की स्वतंत्रता में सहायक होता है। 

🔹बर्लिन के अनुसार, सकारात्मक स्वतंत्रता में व्यक्ति राज्य का दास बन जाता है । तथा उसके जीवन में राज्य का नियंत्रण स्थापित हो जाता है । उनके अनुसार  स्वतंत्रता का आशय प्रतिबंधों के अभाव से है ।

🔹इसायाह बर्लिन ने नकारात्मक स्वतंत्रता को अधिक सुरक्षित और व्यावहारिक माना, क्योंकि यह व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता की रक्षा करती है तथा सत्ता के दुरुपयोग को सीमित करती है । 

🔹 बर्लिन की रचनाएं निम्नलिखित हैं 

Two concept of Liberty (1958)

Karl Marks : His life and  Environment (1939)

Four Essay on liberty (1969)

Vivo and herder (1976)

  


स्वतंत्रता पर जॉन स्टुअर्ट मिल के विचार 

(J S Mill on Liberty) : 


वर्ष 1859 में प्रकाशित जॉन स्टुअर्ट मिल की पुस्तक ऑन लिबर्टी (On Liberty),  में उन्होंने अपने स्वतंत्रता संबंधित विचार दिए । यह अब तक की सबसे प्रसिद्ध कृतियों में से एक है । उनकी स्वतंत्रता का आशय विचार , अभिव्यक्ति एवं भाषण की पूर्ण स्वतंत्रता से है । उनके अनुसार व्यक्ति अपने मन एवं शरीर का स्वामी है उस पर किसी प्रकार का प्रतिबंध बुरा है । उनके अनुसार , व्यक्ति के विकास एवं सभ्यता के विकास के लिए स्वतंत्रता आवश्यक है । उन्होंने शास्त्रीय उदारवादी आदर्शों का समर्थन किया, विशेष रूप से निरंकुश राज्य सत्ता के विरुद्ध व्यक्तियों की स्वतंत्रता, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ज़ोर दिया।

स्वतंत्रता पर जॉन लॉक के विचार :

जॉन लॉक को उदारवाद का जनक कहा जाता है । उन्होंने स्वतंत्रता के उदारवादी पक्ष की व्याख्या की ।उनके विचार मुख्यतः उनकी कृति“Two Treatises of Government” (1689) में मिलते हैं। उन्होंने मानव के प्राकृतिक अधिकारों में स्वतंत्रता को शामिल किया , परंतु उन्होंने स्वतंत्रता को बहुमत के अधीन बताया । लॉक के अनुसार स्वतंत्रता कानून के अभाव में नहीं, बल्कि कानून के अंतर्गत संभव है। 

स्वतंत्रता पर भारतीय दार्शनिकों के विचार :

1. आदि शंकराचार्य (अद्वैत वेदांत)

उनके अनुसार सच्ची स्वतंत्रता आत्मा की अनुभूति से मिलती है।

जब जीव आत्मा और परमात्मा के अद्वैत को जान लेता है, तब मोह, बंधन और दुःख से मुक्त होकर पूर्ण स्वतंत्रता का अनुभव करता है।

बाहरी स्वतंत्रता क्षणिक है, परंतु आत्मिक मुक्ति ही वास्तविक स्वतंत्रता है।


2. महात्मा बुद्ध

बुद्ध ने स्वतंत्रता को निर्वाण के रूप में समझाया।

जब मनुष्य तृष्णा (लालसा) और अविद्या (अज्ञान) से मुक्त होता है, तभी उसे सच्चा स्वातंत्र्य प्राप्त होता है।

उनके अनुसार स्वतंत्रता का मार्ग अष्टांगिक मार्ग (सम्यक दृष्टि, सम्यक आचरण आदि) से होकर जाता है।


3. स्वामी विवेकानंद

उन्होंने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को समाजसेवा और राष्ट्रनिर्माण से जोड़ा।

विवेकानंद के अनुसार केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है; आत्मनिर्भरता, आत्मशक्ति और आत्मज्ञान से ही वास्तविक स्वतंत्रता आती है।

वे कहते थे— "स्वतंत्रता का अर्थ है आत्मा को पहचानना और उसे व्यक्त करने का साहस करना।"


4. महात्मा गांधी

गांधीजी ने स्वतंत्रता को सत्य और अहिंसा से जोड़ा।

उनके लिए राजनीतिक स्वराज तभी सार्थक है जब प्रत्येक व्यक्ति को आत्म-नियंत्रण (self-rule) और नैतिक स्वतंत्रता प्राप्त हो।

गांधीजी का स्वराज केवल अंग्रेज़ों से मुक्ति नहीं, बल्कि स्वयं पर नियंत्रण और ग्राम-स्वराज की स्थापना था।


5. अरविन्द घोष (श्री अरविन्द)

उन्होंने स्वतंत्रता को राष्ट्र की आध्यात्मिक नियति से जोड़ा।

उनके अनुसार भारत का स्वाधीन होना केवल राजनीतिक घटना नहीं बल्कि मानवता के आध्यात्मिक उत्थान का एक साधन है।

उन्होंने "पूर्ण स्वतंत्रता" को न केवल राष्ट्र की मुक्ति बल्कि आत्मा की मुक्ति से जोड़ा।


6. डॉ. भीमराव अंबेडकर

अंबेडकर के लिए स्वतंत्रता का अर्थ था— सामाजिक न्याय और समानता

उन्होंने कहा कि यदि समाज जाति, ऊँच-नीच और भेदभाव से मुक्त नहीं होता, तो राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी है।

उनके लिए स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ था— प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार और अवसर मिलना।


स्वतंत्रता के प्रकार  (Types Of Liberty in Political science)


स्वतंत्रता के कई प्रकार होते हैं, जिनमें कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं:

राजनीतिक स्वतंत्रता (Political Liberty) :

राजनीतिक स्वतंत्रता से अभिप्राय मतदान एवं राजनीति में सहभागिता के अधिकार से है । रूसो के अनुसार , राजनीतिक स्वतंत्रता का आशय, जनप्रभुता का एक अंश होना है । राजनीतिक स्वतंत्रता को उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद से मुक्ति के रूप में भी देख जाता है । 

        राजनीतिक स्वतंत्रता से संबंधित प्रमुख तत्व निम्नलिखित हैं। 

🔹 मतदान का अधिकार : व्यक्ति को मतदान करने तथा सरकार चुनने का अधिकार प्राप्त होना चाहिए । 

🔹चुनाव लड़ने का अधिकार : सभी नागरिकों को चुनाव लड़ने की स्वतंत्रता होना चाहिए तथा जन प्रतिनिधि के रूप में काम करने की स्वतंत्रता होना चाहिए । 

🔹 राजनीतिक दल बनाने एवं अपने राजनीतिक विचारों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता होना चाहिए। 

🔹सरकार के खिलाफ आंदोलन करने तथा शांतिपूर्ण तरीके से उसके द्वारा किए गए गलत कार्यों का विरोध करने की स्वतंत्रता होना चाहिए । 

🔹सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समान स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त होना चाहिए ,किसी के साथ जाति,लिंग,धर्म आदि के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए । 

नागरिक स्वतंत्रता ( Civil Liberty) :

बार्कर के अनुसार , नागरिक स्वतंत्रता व्यक्ति को व्यक्ति होने के नाते प्राप्त होना चाहिए ।  यह व्यक्तियों को उत्पीड़न या अनुचित व्यवहार से बचाती है और उनके लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अधिकार प्रदान करती है। नागरिक स्वतंत्रता के प्रमुख तत्व निम्नलिखित हैं। 

🔹 अभिव्यक्ति एवं आवागमन की स्वतंत्रता । 

🔹समझौते की स्वतंत्रता।

🔹जीवन, स्वास्थ्य और शरीर को किसी बाह्य खतरे से मुक्त रखने की स्वतंत्रता ।

              भारतीय संविधान में अनुच्छेद 19 के तहत कई नागरिक स्वतंत्रताएं दी गई हैं, जैसे भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। 

व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) : 


किसी बाहरी व्यक्ति या संगठन के नियंत्रण से मुक्ति ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता है । इसमें व्यक्ति को अपनी पसंद के अनुसार कार्य करने, अपनी इच्छाओं को पूरा करने और अपने विचारों को व्यक्त करने का अधिकार शामिल है। 

आर्थिक स्वतंत्रता (Economic Liberty) :

आर्थिक स्वतंत्रता का अभिप्राय आर्थिक निर्णयों को स्वतंत्र रूप से लेने और अपनी संपत्ति का उपभोग करने की स्वतंत्रता है। इसमें व्यक्ति को रोजगार , या न्यूनतम रोजगार की सुनिश्चितता एवं समाज के अभावग्रस्त लोगों के लिए न्यूनतम आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति शामिल है । 

सामाजिक स्वतंत्रता (Social Liberty) :

बहुमत समाज के विरुद्ध , प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपनी इच्छा अनुसार कार्य करना ही सामाजिक स्वतंत्रता है।  इसमें व्यक्ति को समाज में बिना किसी भेदभाव या बाधा के रहने, विचार व्यक्त करने और अपनी पसंद के लोगों के साथ जुड़ने की स्वतंत्रता शामिल है । समाज में व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार का जाति,धर्म या लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए । 

नैसर्गिक (प्राकृतिक) स्वतंत्रता: 

बिना किसी मानवीय कानून या सामाजिक प्रतिबंधों के व्यक्ति के स्वाभाविक अधिकारों और स्वतंत्रता को नैसर्गिक स्वतंत्रता कहा जाता है। यह व्यक्ति को प्रकृति द्वारा प्राप्त होती है किसी राज्य या कानून द्वारा नहीं । इसमें व्यक्ति बिना किसी हस्तक्षेप के अपनी इच्छानुसार कार्य करने के लिए स्वतंत्र होता है ।


नकारात्मक व सकारात्मक स्वतंत्रता 

(Negative Liberty and Positive Liberty) 

नकारात्मक स्वतंत्रता (Negative Liberty):

नकारात्मक स्वतंत्रता का अर्थ है बाहरी हस्तक्षेप या प्रतिबंध से मुक्ति। अर्थात कोई व्यक्ति जब बिना किसी कानून या सरकार के हस्तक्षेप के अपने काम को कर सके ।इसके विचारकों के अनुसार व्यक्ति विवेकशील है ,व्यक्ति को अकेला छोड़ देना चाहिए। उस पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध बुरा है। 

नकारात्मक स्वतंत्रता के विचारकों में बेन्थम, जे एस मिल, बर्लिन, फ्रीडमैन, स्पेंसर,एडम स्मिथ, हेयक एवं नाजिक प्रमुख है । 

स्पेंसर के अनुसार , राज्य इसलिए विद्यमान है , क्योंकि समाज में अपराध विद्यमान है । यदि समाज में अपराध नहीं होगा तो राज्य की आवश्यकता नहीं होगी । उनकी प्रसिद्ध रचना Man verses State (1884) है। 

सकारात्मक स्वतंत्रता (Positive Liberty): 

🔹 सकारात्मक स्वतंत्रता का अर्थ है व्यक्ति तब स्वतंत्र है जब उसे अपने जीवन को बेहतर बनाने के साधन और अवसर उपलब्ध हो । सकारात्मक स्वतंत्रता के प्रमुख विचारकों में रूसो, कांट, हीगल, टी एच ग्रीन, बार्कर,लास्की, लियोस्ट्रास व मैकफर्सन प्रमुख है । 

        रूसो के अनुसार , अपनी तात्विक इच्छा (Real will) के अनुसार कार्य करना ही स्वतंत्रता है । 

      लास्की के अनुसार, स्वतंत्रता का अर्थ ऐसे दशाओं से है जिसमें मनुष्य के विकास का सर्वश्रेष्ठ अवसर उपलब्ध हो , इसलिए स्वतंत्रता अधिकारों से उत्पन्न होती है । उनकी प्रमुख रचना ' A Grammar of politics (1925) है। 

     हीगल के अनुसार , राज्य की आज्ञा का पालन करना ही स्वतंत्रता है।

    टी एच ग्रीन के अनुसार , स्वतंत्रता उन कार्यों को करने और भोगने का नाम है जो करने और भोगने योग्य हो। और जिसका समाज में अन्य व्यक्तियों के साथ साझा उपयोग किया जा सके। 


भारतीय संविधान में स्वतंत्रता का अधिकार(अनुच्छेद 19-22) : 


भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 से 22 , मौलिक अधिकारों का हिस्सा हैं और नागरिकों को स्वतंत्रता व सुरक्षा प्रदान करते हैं।इनका विस्तृत वर्णन निम्नलिखित है । 

 अनुच्छेद 19 – स्वतंत्रता के अधिकार


भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत नागरिकों को निम्नलिखित स्वतंत्रताएँ प्राप्त हैं: 

1.भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ।

2.शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने एवं सभा करने की स्वतंत्रता।

3.संघ या समुदाय बनाने की स्वतंत्रता ।

4.भारत के राज्यक्षेत्र में कहीं भी आने-जाने की स्वतंत्रता ।

5.भारत के किसी भी क्षेत्र में रहने की स्वतंत्रता ।

6.किसी भी व्यवसाय या पेशा अपनाने की स्वतंत्रता ।  


👉 लेकिन इन स्वतंत्रताओं पर समाज की सुरक्षा, शांति, नैतिकता और राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए यथोचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।



अनुच्छेद 20 – अपराधों के लिए संरक्षण


यह अनुच्छेद अपराध और दंड से संबंधित संवैधानिक सुरक्षा देता है:

पूर्वव्यापी दंड (Ex-post facto law) – किसी अपराध के लिए वह कानून लागू नहीं होगा जो अपराध करने के बाद बनाया गया हो।

द्वितीय दंड (Double jeopardy) – किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दोबारा सजा नहीं दी जा सकती।

स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने से छूट (Self-incrimination) – किसी अपराध के आरोपी को अपने ही खिलाफ गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।


अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण


“किसी भी व्यक्ति को उसकी जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है।”

अर्थात, किसी की जान या स्वतंत्रता केवल कानूनन प्रक्रिया से ही छीनी जा सकती है।

इसमें सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार, शिक्षा का अधिकार (अनु. 21A), स्वास्थ्य का अधिकार, स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार आदि भी न्यायपालिका ने शामिल किया है।

👉 यह अनुच्छेद बहुत व्यापक है और समय के साथ इसमें अनेक अधिकार समाहित किए गए हैं।


अनुच्छेद 22 – गिरफ्तारी और निरोध से संबंधित संरक्षण


👉इसके तहत गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी का कारण बताना अनिवार्य है।

👉उसे वकील से परामर्श और बचाव करने का अधिकार प्राप्त है। 

👉24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना आवश्यक है ।

मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना 24 घंटे से अधिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता


निवारक निरोध (Preventive Detention) की व्यवस्था: 


तीन महीने तक: किसी व्यक्ति को बिना किसी सलाहकार बोर्ड की राय के अधिकतम तीन महीने तक नजरबंद किया जा सकता है। 

तीन महीने से अधिक: यदि सलाहकार बोर्ड यह सिफारिश करता है कि व्यक्ति को अधिक समय तक हिरासत में रखा जाना चाहिए, तो निवारक नजरबंदी की अवधि तीन महीने से अधिक बढ़ाई जा सकती है।


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