न्याय (Justice) क्या है? जानिए न्याय का अर्थ, विभिन्न सिद्धांत, अरस्तू व प्लेटो का न्याय विचार, जॉन रॉल्स का न्याय सिद्धांत, धार्मिक न्याय, सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय और महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर हिंदी में।
राजनीति विज्ञान में न्याय की अवधारणा(Justice in Political Science in Hindi)
🔹न्याय (Justice) क्या है ? न्याय का अर्थ
🔹न्याय के विभिन्न सिद्धांत
अरस्तू का न्याय का विचार ।
प्लेटो का न्याय सिद्धांत(Plato's idea of justice in hindi )
जॉन रॉल्स का न्याय सिद्धांत
न्याय का धार्मिक सिद्धांत
🔹न्याय के प्रकार
1. सामाजिक न्याय (Social Justice)
2. आर्थिक न्याय (Economic Justice)
3. राजनीतिक न्याय (Political Justice)
🔹न्याय से संबंधित प्रश्न–उत्तर ।
न्याय (Justice) क्या है ? न्याय का अर्थ :
न्याय (Justice) शब्द लैटिन भाषा के Justia से बना है ,जिसका अर्थ है ' जोड़ना ' । न्याय का अर्थ है – समानता, निष्पक्षता और अधिकारों की रक्षा करते हुए सभी को उचित अवसर देना। यानी हर व्यक्ति को उसके अधिकार और कर्तव्य के अनुरूप निष्पक्ष व्यवहार मिलना।
प्लेटो के अनुसार , न्याय का आशय, समाज में सामंजस्य एवं संतुलन का निर्माण करना है । इसके लिए उन्होंने दो उपाय बताए हैं , दंडित करना तथा पुरस्कृत करना ।
व्यावहारिक रूप में न्याय को परिभाषित करना एक जटिल संकल्पना है क्योंकि इसका प्रयोग कभी नैतिक रूप में , कभी वैधानिक रूप में , तथा कभी सामाजिक,आर्थिक एवं राजनीतिक रूप में किया जाता है। परंतु न्याय के दो पक्षों समानता व निष्पक्षता को सभी विचारकों ने माना है।
न्याय के विभिन्न सिद्धांत
अरस्तू का न्याय का विचार :
न्याय का सबसे बुनियादी सिद्धांत है कि "समान लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए और असमान लोगों के साथ असमान व्यवहार किया जाना चाहिए"।
अरस्तू ने न्याय को “सर्वोत्तम नैतिक गुण” कहा। उनके अनुसार न्याय की निम्नलिखित अवधारणाएं हैं।
संपूर्ण न्याय (Universal Justice):
इस न्याय से आशय, सामाजिक नैतिकता से हैं, अरस्तू ने संपूर्ण न्याय के लिए सात्विकता (Righteousness) शब्द का प्रयोग किया।
वितरणात्मक न्याय (Distributive Justice) :
राज्य द्वारा व्यक्तियों में पद,अवसर एवं योग्यता के अनुसार भौतिक सुविधाएं (सम्मान, धन और अधिकार) वितरित की जानी चाहिए । अरस्तू के अनुसार , समाज में सेवाओं और पदों का वितरण, समाज में किए गए योगदान पर आधारित होगा। अर्थात अरस्तू का न्याय समानुपातिक है।
सुधारात्मक न्याय (Corrective/Rectificatory Justice)
विधि के अनुसार कार्य नहीं करने पर राज्य द्वारा दंड दिया जाना चाहिए । अर्थात जब कोई अन्याय हो जाए (अपराध, धोखा, अनुबंध का उल्लंघन), तो उसे दंड या क्षतिपूर्ति से सुधारना चाहिए।
➡️ अरस्तू कौन थे व उनके अन्य राजनीतिक विचारों एवं उनकी रचनाओं से संबंधित जानकारी के लिए ये आर्टिकल पढ़ें 👉
https://www.polsciencenet.in/2025/12/aristotle-philosophy-in-hindi.html?m=1
प्लेटो का न्याय सिद्धांत:
(Plato's idea of justice in hindi )
प्लेटो के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपना-अपना हक दिलाना ही न्याय है । उनके अनुसार न्याय सिद्धांत ,व्यक्ति की आत्मा का गुण है । प्लेटो तात्कालिक यूनानी समाज में प्रचलित न्याय सिद्धांत का खंडन करता है , जिसका प्रतिपादन सोफिस्ट, पोलीमार्कस , थ्रेसीमैक्स, ग्लूकोन ने किया था । प्लेटो ने अपनी पुस्तक रिपब्लिक में न्याय की सोफिस्ट की धारणा का पूर्ण रूप से खंडन किया ।
🔹 सोफिस्ट मूलतः भौतिकवादी और उपयोगिता वादी विचारक थे । सोफिस्टिक विचारकों में काफ़िलास के अनुसार सत्य बोलना व ऋण चुकाना ही न्याय है । प्लेटो ने इसका खंडन किया । प्लेटो के अनुसार सत्य का पूर्ण ज्ञान परंपराओं व प्रथाओं से प्राप्त नहीं होता , लेकिन प्रत्येक परिस्थिति में सत्य बोलना न्यायपूर्ण नहीं होता।
🔹 पालीमार्कस के अनुसार, शत्रु के साथ शत्रुता एवं मित्र के साथ मित्रता ही न्याय है , परंतु प्लेटों के अनुसार न्याय की संकल्पना व्यक्तिवादी चिंतन पर आधारित है जिसमें व्यक्ति अपने स्वार्थ के आधार पर कार्य करते हैं । प्लेटो के अनुसार , स्वार्थ के आधार पर कार्य करना न्याय नहीं है जबकि अपने नैतिक दायित्वों का पालन करना ही न्याय है ।
🔹 थ्रेसीमैक्स के अनुसार , शक्तिशाली व्यक्ति का हित ही न्याय है, अतः शासकों का स्वार्थ एवं भलाई ही न्याय है । परंतु प्लेटो के अनुसार समूचे समाज की भलाई ही न्याय है, किसी व्यक्ति विशेष या वर्ग मात्र की नहीं।
🔹प्लेटो के अनुसार शक्तिशाली व्यक्ति की बजाय , न्यायपूर्ण व्यक्ति का महत्व ज्यादा है । प्लेटो ने ग्लूकोन के न्याय की मान्यता का खंडन करते हुए कहा कि न्याय बाह्य नहीं, बल्कि आंतरिक होता है । यह कृत्रिम रूप में निर्मित नहीं हो सकता। उनके अनुसार न्याय के दो पहलू है।
(i) वैयक्तिक स्तर पर न्याय :
आत्मा के तीनों गुणों में सामंजस्य ही न्याय है ।
(ii) सामाजिक स्तर पर न्याय :
समाज के तीनों वर्गों द्वारा अपने कर्तव्यों का निष्पादन करना तथा दूसरे के कार्य में हस्तक्षेप न करना ।
🔹प्लेटो का न्याय कर्तव्य पर आधारित है , जबकि आधुनिक न्याय की संकल्पना अधिकारों पर आधारित है। प्लेटो का न्याय नैतिकता से परिचालित है,जबकि आधुनिक न्याय विधि द्वारा परिचालित है। प्लेटो के विचार में स्वतंत्रता, समानता या अधिकार की कोई संकल्पना नहीं है।
https://www.polsciencenet.in/2025/12/plato-philosophy.html?m=1
जॉन रॉल्स का न्याय सिद्धांत :
(John Rawls Theory of Justice in Hindi )
जॉन रॉल्स ने अपनी पुस्तक “A Theory of Justice” (1971) में न्याय को Fairness (निष्पक्षता) कहा।उनका न्याय का सिद्धांत परिणाम निरपेक्ष है ,जिसमें प्रक्रिया पर अधिक बल दिया गया है । उनका ये सिद्धांत कांट के आदर्शवादी विचारों पर आधारित है ।उन्होंने व्यक्ति की गरिमा को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना तथा वेंथम के न्याय के मूल आधार को अस्वीकृत कर दिया ।
जॉन रॉल्स ने अपने न्याय के सिद्धांत में स्वतंत्रता, अवसर की समानता व निष्पक्षता के स्वरूप को स्वीकार किया। उन्होंने न्याय सिद्धांत का निर्माण करने के लिए , सामाजिक समझौते व अज्ञान के पर्दे का सहारा लिया ।
उन्होंने न्याय के दो सिद्धांतों का वर्णन किया है ।
पहला सिद्धांत: प्रत्येक व्यक्ति को समान और अधिकतम संभव स्वतंत्रता का अधिकार है, जो अन्य सभी की स्वतंत्रता के अनुकूल हो।
दूसरा सिद्धांत: सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ तभी स्वीकार्य हैं जब वे ऐसे पदों से जुड़ी हों जो सभी के लिए खुले हों और समाज के सबसे वंचित वर्ग के लिए लाभकारी हों।
न्याय का धार्मिक सिद्धांत:
यह सिद्धांत इस विचार पर आधारित है कि सभी लोग ईश्वर की संतान हैं और उन्हें समान व्यवहार मिलना चाहिए, जैसा कि धार्मिक ग्रंथों में उल्लेखित है।
न्याय के प्रकार :
भारतीय संविधान और सामान्य राजनीतिक दर्शन के अनुसार न्याय मुख्यतः तीन प्रकार का माना जाता है –
1. सामाजिक न्याय (Social Justice):
सामाजिक न्याय का मतलब है – समाज में हर व्यक्ति को समान अवसर और सम्मान दिलाना, ताकि कोई भी व्यक्ति जाति, धर्म, लिंग, भाषा, नस्ल, जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव का शिकार न हो।
यह केवल "कानून के सामने समानता" तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज की वास्तविक असमानताओं को मिटाकर कमजोर वर्गों को सशक्त करना, समाज की चेतना को जगाना, जन-जागरूकता और शिक्षा के माध्यम से सामाजिक न्याय के मूल्यों को स्थापित करना ही वास्तविक न्याय है।
सामाजिक न्याय के उद्देश्य
🔹 जाति, वर्ग, धर्म, लिंग पर आधारित सामाजिक असमानता समाप्त करना।
🔹सभी को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार का अवसर उपलब्ध कराना।
🔹हाशिये पर मौजूद वर्गों (SC, ST, OBC, महिलाएँ, अल्पसंख्यक) को मुख्यधारा में लाना।
🔹समानता और बंधुत्व की भावना स्थापित करना।
भारतीय संविधान और सामाजिक न्याय
प्रस्तावना – सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने का वचन देती है।
अनुच्छेद 14–18 – समानता का अधिकार।
अनुच्छेद 15(4) और 16(4) – शिक्षा व नौकरियों में आरक्षण।
अनुच्छेद 38 व 39 (डीपीएसपी) – आर्थिक-सामाजिक समानता को बढ़ावा।
अनुच्छेद 46 – अनुसूचित जाति/जनजाति व कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा।
सामाजिक न्याय के उदाहरण
🔹आरक्षण नीति: SC, ST, OBC को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण।
🔹महिला आरक्षण विधेयक (2023): संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीट आरक्षित।
🔹दलित आंदोलन और सामाजिक सुधार आंदोलन: डॉ. आंबेडकर, ज्योतिबा फुले, पेरियार आदि के प्रयास।
🔹मिड-डे मील योजना: बच्चों को शिक्षा में जोड़ने और पोषण सुनिश्चित करने के लिए।
🔹अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान (पंचायतों में आरक्षण, वनाधिकार कानून)।
राजनीतिज्ञों और विचारकों के विचार
डॉ. भीमराव अंबेडकर:
उन्होंने कहा, “समानता केवल कानून में नहीं, बल्कि समाज में भी होनी चाहिए।” उनके अनुसार जातिगत भेदभाव को खत्म करना सामाजिक न्याय की सबसे बड़ी शर्त है।
जवाहरलाल नेहरू:
“राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब सामाजिक और आर्थिक न्याय की स्थापना हो।”
महात्मा गांधी:
“अंत्योदय” (समाज के अंतिम व्यक्ति का उत्थान) को सामाजिक न्याय का आधार माना।
राजेन्द्र प्रसाद (भारत के पहले राष्ट्रपति):
संविधान सभा में कहा – “सामाजिक न्याय के बिना लोकतंत्र अधूरा है।”
राममनोहर लोहिया:
“पिछड़े पावें सौ में साठ” – सामाजिक न्याय की मांग को राजनीतिक मुद्दा बनाया।
2. आर्थिक न्याय (Economic Justice):
आर्थिक न्याय का अर्थ है – समाज में धन, अवसर और संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण, ताकि कोई व्यक्ति गरीबी, शोषण या असमानता का शिकार न हो। इसका उद्देश्य है कि हर व्यक्ति को रोज़गार, सम्मानजनक जीवन स्तर और सामाजिक सुरक्षा मिले।
भारतीय संविधान में आर्थिक न्याय
अनुच्छेद 38: राज्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करेगा।
अनुच्छेद 39:
➡️धन और उत्पादन के साधनों पर अधिकार केवल कुछ लोगों तक सीमित न हो , सभी को समान अधिकार मिले ।
➡️पुरुष और महिला को समान काम के लिए समान वेतन मिलना चाहिए।
➡️श्रमिकों, पुरुष और महिला, और बच्चों का स्वास्थ्य और शक्ति का दुरुपयोग न हो तथा उन्हें आर्थिक आवश्यकता के कारण अनुचित काम करने के लिए विवश न किया जाए।
अनुच्छेद 41:
➡️हर नागरिक को रोजगार प्राप्त करने का अवसर मिले।
➡️सभी नागरिकों को शिक्षा का अवसर उपलब्ध हो।
(शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act) 2009 → 6 से 14 वर्ष तक बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार।)
➡️बेरोजगार, वृद्ध, असमर्थ (disabled) और अन्य कमजोर वर्गों को सामाजिक सुरक्षा और सहायता प्रदान की जाए।
अनुच्छेद 43: श्रमिकों के लिए उचित वेतन और जीवन स्तर।
3. राजनीतिक न्याय (Political Justice):
राजनीतिक न्याय का अर्थ है – सभी नागरिकों को राजनीति में समान अवसर और अधिकार देना, ताकि हर व्यक्ति शासन की प्रक्रिया में भाग ले सके।किसी भी नागरिक के साथ जाति, धर्म, लिंग, भाषा, संपत्ति या शिक्षा के आधार पर भेदभाव किए बिना सभी को राजनीतिक अधिकार मिलें।
भारतीय संविधान में राजनीतिक न्याय से जुड़े अनुच्छेद :
अनुच्छेद 14 → कानून के सामने समानता।
अनुच्छेद 15 → भेदभाव का निषेध।
अनुच्छेद 16 → सार्वजनिक पदों पर समान अवसर।
अनुच्छेद 19(1)(a)–(c) → अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन बनाने का अधिकार।
अनुच्छेद 325–326 → सार्वभौम वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise), यानी 18 वर्ष से अधिक सभी को वोट देने का अधिकार।
अनुच्छेद 243 → पंचायतों/नगरपालिकाओं में भागीदारी (स्थानीय स्वशासन)।
राजनीतिक न्याय के उदाहरण
➡️भारत में सार्वभौम वयस्क मताधिकार (18 वर्ष से ऊपर हर नागरिक को वोट देने का अधिकार)।
➡️महिला आरक्षण विधेयक 2023 → संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीट आरक्षित।
➡️SC/ST/OBC आरक्षण → राजनीति और स्थानीय निकायों में भागीदारी।
➡️पंचायती राज व्यवस्था → ग्रामीण स्तर पर लोकतंत्र और समान राजनीतिक अवसर।
➡️निर्वाचन आयोग (Election Commission) → स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना।
राजनीतिक न्याय पर विचारकों के विचार :
डॉ. भीमराव अंबेडकर:
“राजनीतिक लोकतंत्र तभी सफल है जब वह सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र के साथ हो।”
जवाहरलाल नेहरू:
“सिर्फ मताधिकार देना ही काफी नहीं है, बल्कि जनता को राजनीतिक चेतना और समान अवसर भी मिलने चाहिए।”
महात्मा गांधी:
“लोकतंत्र का असली अर्थ है – जनता की सक्रिय भागीदारी और अंतिम व्यक्ति की आवाज़ का सम्मान।”
भारतीय संविधान में न्याय:
प्रस्तावना (Preamble) में स्पष्ट रूप से कहा गया है:
"सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय" देना भारत का मूल उद्देश्य है।
अनुच्छेद 32 → संवैधानिक उपचार का अधिकार, जो न्याय पाने का मूल आधार है।
📑 न्याय से संबंधित प्रश्न–उत्तर (संक्षिप्त नोट्स)
Q.1 न्याय से आप क्या समझते हैं?
👉 न्याय का अर्थ है – समाज में प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर, अधिकार और निष्पक्षता प्रदान करना।
Q.2 न्याय के कितने प्रकार हैं?
👉 न्याय के मुख्य तीन प्रकार माने जाते हैं:
1. सामाजिक न्याय – जाति, धर्म, लिंग आदि पर आधारित भेदभाव समाप्त करना।
2. आर्थिक न्याय – धन व संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण, सभी को रोजगार और सुरक्षा देना
3. राजनीतिक न्याय – सभी नागरिकों को समान राजनीतिक अधिकार (मतदान, चुनाव लड़ने और राजनीति में भागीदारी) देना।
Q.3 भारतीय संविधान में न्याय कहाँ उल्लेखित है?
👉 संविधान की प्रस्तावना में "सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय" का स्पष्ट उल्लेख है।
👉 संबंधित अनुच्छेद:
14–18 → समानता का अधिकार।
19–22 → स्वतंत्रता।
39, 41, 43 → नीति निदेशक तत्व (DPSP)।
Q.4 सामाजिक न्याय क्या है? उदाहरण सहित।
👉 सामाजिक न्याय = जाति, लिंग, धर्म आदि के आधार पर समान अवसर और सम्मान देना।
उदाहरण: आरक्षण नीति, महिला आरक्षण विधेयक 2023, मिड-डे मील योजना।
Q.5 आर्थिक न्याय क्या है?
👉 आर्थिक न्याय = धन और अवसरों का न्यायपूर्ण वितरण।
उदाहरण: मनरेगा 2005, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, आयुष्मान भारत योजना।
Q.6 राजनीतिक न्याय क्या है?
👉 राजनीतिक न्याय = सभी नागरिकों को राजनीति में समान भागीदारी का अवसर देना।
उदाहरण: सार्वभौम वयस्क मताधिकार (18+ को वोट का अधिकार), महिला आरक्षण विधेयक 2023, पंचायतों में SC/ST/OBC व महिला आरक्षण।
Q.7 अनुच्छेद 39 क्या कहता है?
👉 राज्य नीति में निर्देश देता है:
सभी को आजीविका का अधिकार।
समान कार्य के लिए समान वेतन।
संसाधनों का समान वितरण।
बच्चों और श्रमिकों का शोषण न हो।
Q.8 अनुच्छेद 41 का मुख्य प्रावधान क्या है?
👉 राज्य काम करने का अधिकार, शिक्षा और बेरोजगार/वृद्ध/विकलांगों को सार्वजनिक सहायता उपलब्ध कराएगा।
Q.9 अनुच्छेद 43 में क्या प्रावधान है?
👉 श्रमिकों को जीवन निर्वाह योग्य वेतन, सम्मानजनक कार्य दशाएँ और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने की व्यवस्था।
Q.10 डॉ. भीमराव अंबेडकर का न्याय पर क्या विचार था?
👉 “राजनीतिक लोकतंत्र तभी सार्थक है जब वह सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र के साथ जुड़ा हो।”
Q.11 महात्मा गांधी का सामाजिक न्याय पर दृष्टिकोण क्या था?
👉 गांधीजी ने “अंत्योदय” (समाज के अंतिम व्यक्ति का उत्थान) को सामाजिक न्याय का आधार माना।
Q.12 समकालीन उदाहरण बताइए जहाँ न्याय लागू होता है।
👉सामाजिक न्याय: आरक्षण नीति, वेमहिला आरक्षण विधेयक।
आर्थिक न्याय: मनरेगा, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत।
राजनीतिक न्याय: सार्वभौम वयस्क मताधिकार, पंचायत चुनावों में आरक्षण।
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