🔹मार्क्सवाद (साम्यवाद) और विकासवादी समाजवाद में प्रमुख अंतर
🔹फेबियन समाजवाद: समूहवाद और लोकतांत्रिक समाजवाद का सिद्धांत
🔹 गिल्ड समाजवाद: औद्योगिक लोकतंत्र का वैकल्पिक मॉडल
🔹 बाज़ारवादी समाजवाद: 20वीं सदी के समाजवाद की नई दिशा
🔹नव-संशोधनवाद: तीसरे मार्ग (Third Way) की राजनीतिक अवधारणा
मार्क्सवाद (साम्यवाद) और विकासवादी(लोकतंत्रात्मक)समाजवाद में अंतर
मार्क्सवाद को साम्यवाद भी कहा जाता है तथा विकासवादी समाजवाद को लोकतंत्रात्मक समाजवाद कहा जाता है , इनकी विचारधाराओं में निम्नलिखित अंतर है ।
1. विकासवादी समाजवाद ऐसे विचारधारा है ,जो समाज को धीरे धीरे लोकतांत्रिक तरीके से बदलना चाहती है, जबकि मार्क्सवाद वह विचारधारा है जो समाज में संघर्ष के माध्यम से समाजवाद स्थापित करना चाहती है क्योंकि इनका मानना है कि इतिहास में सभी सामाजिक परिवर्तन वर्ग संघर्ष से ही हुए हैं।
2. विकासवादी समाजवाद नैतिक समाजवाद है , क्योंकि यह नैतिकता के मार्ग को अपनाते हैं ,जबकि मार्क्सवाद वैज्ञानिक समाजवाद है ।
3. विकासवादी समाजवाद संशोधनवादी है,जबकि मार्क्सवाद रूढ़िवादी है ।
4. विकासवादी समाजवाद पूंजीवाद के मानविकीकरण के समर्थक हैं, जबकि मार्क्सवाद पूंजीवाद का कठोर विरोधी है और इसे जड़ से उखाड़ फेंकना चाहते हैं।
5. विकासवादी समाजवाद समाज में हो रहे वर्ग संघर्षों का शांतिपूर्ण तरीके से समाधान चाहते हैं,जबकि मार्क्सवाद वर्ग विहीन एवं राज्य विहीन समाज के समर्थक हैं।
6. विकासवादी समाजवाद आर्थिक व्यवस्था को महत्वपूर्ण मानते हैं जबकि मार्क्सवाद केंद्रीय नियोजन को महत्व देते हैं।
7. लोकतांत्रिक समाजवाद वस्तुओं के समान वितरण का समर्थन करते हैं ,मार्क्सवाद उत्पादन के साधनों (भूमि, मशीन और संसाधन) पर सामूहिक स्वामित्व की बात करते हैं।
8. लोकतांत्रिक समाजवाद सापेक्षिक समानता को स्वीकार करता है ,परंतु साम्यवाद (मार्क्सवाद) निरपेक्ष समानता का समर्थन करता है ।
9. विकासवादी समाजवाद लोकतांत्रिक संसदीय प्रणाली को मानता है ,जबकि मार्क्सवाद के अनुसार सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व होना चाहिए ।
10. सामाजिक लोकतंत्रवाद राजनीतिक बहुलवाद को मानता है,जबकि साम्यवाद एकदलीय शासन को महत्व देता है ।
11. विकासवादी समाजवाद एक आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था है, जिसमें उत्पादन के साधनों पर समाज या राज्य का नियंत्रण हो और समानता पर ज़ोर दिया जाए, जबकि मार्क्सवाद (Marxism) जर्मन दार्शनिक कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा विकसित एक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विचारधारा है। यह समाज की संरचना, अर्थव्यवस्था, वर्ग-संघर्ष और सामाजिक परिवर्तन को समझाने का एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।
फेबियन समाजवाद (समूहवाद, लोकतांत्रिक समाजवाद)
ब्रिटेन के फेबियन समाजवाद का नाम रोम के सैनिक फेबियस केंकटेटर के नाम पर पड़ा था जिसने युद्ध में क्रमिक तरीकों का प्रयोग किया। इस विचारधारा के प्रमुख विचारक बनार्ड शॉ, एच जी बेल्स, एनी बेसेंट, सिडनी वेब, रिचर्ड टोनी, ग्राहम वालास आदि हैं।
इस विचारधारा की उत्पत्ति 1884 में ब्रिटेन के फेबियस सोसायटी में हुआ था । इनके अनुसार क्रमिक , शांतिपूर्ण व लोकतांत्रिक तरीके से समाजवाद की प्राप्ति संभव है ।
🔹इनके अनुसार समाज में विषमता को दूर करने के लिए भूमि व पूंजी पर राज्य का सामूहिक नियंत्रण होना चाहिए। वस्तुओं का उत्पादन व वितरण सामूहिक हित के लिए होना चाहिए, निजी लाभ के लिए नहीं ।
🔹 लेडलर ने फेबियन समाजवाद की विशेषताओं को निम्न रूप में व्यक्त किया ।
(i) पूंजीवाद से समाजवाद की ओर संक्रमण एक क्रमिक या निरंतर प्रक्रिया है।
(ii) उद्योगों पर समूह या राज्य का नियंत्रण शांतिपूर्ण रूप में होना चाहिए । इनके अनुसार माध्यम वर्ग के द्वारा प्रशासन का प्रयोग करते हुए एक नए सामाजिक व्यवस्था का निर्माण किया जाना चाहिए ।
(iii) समाजवाद की प्राप्ति समुदाय में समाजवादी आदर्शों के प्रति चेतना जागृत करके प्राप्त हो सकती है ।
🔹 ब्रिटेन में द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात लेबर पार्टी ने फेबियन समाजवादी विचारधारा को व्यावहारिक रूप में लागू करने का प्रयत्न किया । इनके अनुसार समाज के मूल्यों का निर्माण समुदाय के द्वारा होता है , अतः इन मूल्यों से प्राप्त लाभ पर भी समुदाय का नियंत्रण होना चाहिए।
🔹फेबियन समाजवादी ,जे एस मिल एवं हेनरी जॉर्ज से प्रभावित थे , स्वतंत्रता प्राप्त होने के पश्चात भारत में भी फेबियन समाजवाद अपनाया गया ।
गिल्ड समाजवाद (औद्योगिक लोकतंत्र) :
गिल्ड समाजवाद इंग्लैंड की एक समाजवादी विचारधारा है रोक्काे के अनुसार गिल्ड समाजवाद अंग्रेजी फेबियनवाद व फ्रांसीसी श्रम संघवाद का बौद्धिक शिशु है । यह राज्य को विकेंद्रित करने का समर्थक है । इसके अनुसार राज्य का नियंत्रण आर्थिक गतिविधियों के आधार पर नहीं होना चाहिए , अर्थव्यवस्था पर गिल्ड का नियंत्रण होना चाहिए ।
🔹 इसके मुख्य समर्थक जी डी एच कोल, ए आर ऑरेज हैं। इनके विचार निम्नलिखित हैं।
(i) उनके अनुसार उत्पादन पर गिल्ड का नियंत्रण होना चाहिए और उद्योगों पर गिल्ड का स्वशासन होना चाहिए।
(ii) उनके अनुसार मजदूरों को मजदूरी नहीं बल्कि वेतन प्राप्त होना चाहिए क्योंकि मजदूरी नैतिक मनोवैज्ञानिक रूप में बुरी है, जिसके द्वारा दास मानसिकता का निर्माण होता है व श्रमिकों को सृजनात्मक क्षमता का भी ह्रास होता है ।
(iii) ये पूंजीवादी व्यवस्था की मजदूरी पद्धति व लाभ निर्माण के आलोचक हैं ।
🔹सी एम जोड के अनुसार गिल्ड समाजवाद प्रकार्यात्मक लोकतंत्र है,इनके अनुसार हितों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए , व्यक्तियों का नहीं । ये समाजवाद की प्राप्ति के लिए हिंसा को अस्वीकार करते हैं तथा संसदीय प्रणाली के भी पूर्ण समर्थक नहीं हैं ।
👉 गिल्ड एक तरह का मजदूर सहकारी संगठन है ,जो उत्पादन की योजना बनाता है , मजदूरों के अधिकार तय करता है तथा उत्पादन एवं गुणवत्ता की दिशा नियंत्रित करता है । यह जनता के प्रति जवाबदेह होता है ।
🔹गिल्ड समाजवाद क्यों आया?
ब्रिटेन में औद्योगिक पूंजीवाद बढ़ रहा था ,जिसके विरोध में ट्रेड यूनियन की शक्ति बढ़ी लेकिन संपूर्ण नियंत्रण नहीं हो पाया ,इसलिए मजदूरों को उनका हिस्सा दिलाने के उद्देश्य से गिल्ड समाजवाद का उदय हुआ ।
बाजारवादी समाजवाद (20वीं सदी का समाजवाद) :
बाजारवादी समाजवाद वह समाजवाद है जिसमें उत्पादन के साधनों का स्वामित्व समाज या राज्य के पास होता है, लेकिन उत्पादन एवं मूल्यों का निर्धारण बाजार की प्रतिस्पर्धा के माध्यम से होता है ।
उदय: 1990 में फ्रांसिस फुकोयामा ने उदारवाद की विश्व विजय की घोषणा की । जिसका अर्थ था कि अब समाजवाद पूरी तरह से समाप्त हो चुका है ।सोवियत संघ की मार्क्सवादी व्यवस्था का पतन हो गया , चीन व वियतनाम ने उदारीकरण के मार्ग को अपना लिया । अतः केंद्रीयकृत नियोजन पर आधारित आर्थिक प्रणाली असफल सिद्ध हुई । पूर्व साम्यवादी देशों ने भी बाजारवादी व्यवस्था को अपना लिया । देंग शियाओपिंग ने 1978 में बाजारवादी समाजवाद का नारा दिया तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया । राज्यों में भी मुख्य बाजारवादी व्यवस्था को अपनाया गया । उत्पादन के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को कार्य करने की अनुमति दी गई परंतु वितरण के क्षेत्र में राज्यों का नियंत्रण बना रहा इसलिए चीन में बाजारवाद को साधन व समाजवाद को आदर्श माना गया ।
🔹1980 के दशक में अमेरिका में कंप्यूटर की क्रांति हुई एवं सोवियत संघ भी आर्थिक संकट से ग्रस्त हो रहा था , परिणामस्वरूप 1985 में सोवियतसंघ ने भी उदारीकरण को अपना लिया । अतः अधिकांश एशियाई व अफ्रीकी देशों ने बाजारवादी व्यवस्था को अपना लिया ।
नव-संशोधनवाद (तीसरा मार्ग) :
1980 के दशक के बाद समाजवादी दलों ने नया सुधारवादी दृष्टिकोण अपनाया परंपरागत समाजवादी अवधारणा में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया व्यावहारिक रूप में तीसरा मार्ग का प्रयोग अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन व ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने किया और इसी के साथ इसे अन्य राज्यों में भी स्वीकार किया गया जिसमें नीदरलैंड, इटली न्यूजीलैंड व जर्मनी प्रमुख है ।
🔹 नव संशोधन वाद कोई व्यवस्थित विचारधारा नहीं है बल्कि विभिन्न विचारों व मूल्यों का समन्वय है , यह नव उदारवाद या पूंजीवाद व परंपरागत समाजवाद के मध्य का मार्ग है । सन 1995 में ब्रिटेन की लेबर पार्टी ने अपने दल के संविधान में गतिशील बाजारवादी व्यवस्था को स्वीकार किया । उनके अनुसार समाज में सहयोग और बंधुत्व आवश्यक है अतः ये नव उदारवादियों की नैतिक मान्यता का खंडन करते हैं परंतु नव उदारवादियों की आर्थिक मान्यता को स्वीकार करते हैं ।
🔹 इस विचारधारा के अनुसार राज्य के द्वारा सामाजिक निवेश होना चाहिए जिससे लोगों के ज्ञान व कुशलता में वृद्धि की जा सके । राज्य का मूल कार्य लोगों की अभिवृत्ति, मूल्य व ज्ञान को बढ़ावा देना है , केवल वस्तुएं प्रदान करना मात्र नहीं है ।
आलोचना : स्पेंसर के अनुसार समाजवाद दासता का दूसरा नाम है समाजवाद में प्रत्येक व्यक्ति समुदाय का दास बन जाता है । समाजवाद में आर्थिक प्रणाली का नियंत्रण केंद्रीय सत्ता द्वारा किया जाता है इसलिए व्यक्ति की स्वायत्तता व स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है ।
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