मार्क्सवाद क्या है? मार्क्सवाद का अर्थ , विशेषताएं, सिद्धांत ।मार्क्सवाद-लेनिनवाद क्या है । मार्क्सवादी राज्य का विचार ,मार्क्सवाद की आलोचना ।



🔹मार्क्सवाद क्या है ? मार्क्सवाद का अर्थ।  

🔹मार्क्सवाद का सिद्धांत ।

🔹 मार्क्सवाद की प्रमुख विशेषताएँ ।

🔹मार्क्सवाद–लेनिनवाद क्या है ? 

🔹मार्क्सवादी राज्य का विचार ।

🔹मार्क्सवाद की आलोचना । 





 मार्क्सवाद क्या है ? मार्क्सवाद का अर्थ।   


मार्क्सवाद वह राजनीतिक आर्थिक और सामाजिक सिद्धांतों का समुच्चय है जिन्हें 19वीं सदी में कार्ल मार्क्सफ्रेडरिक एंजेल्स ने समाजवाद के वैज्ञानिक आधार की पुष्टि के लिए प्रस्तुत किया । इसका मुख्य उद्देश्य समाज में हो रहे शोषण व असमानता को समाप्त करना है। उनके अनुसार उत्पादन के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व होना चाहिए तथा  वह वर्ग विहीन समाज की संकल्पना करते हैं ।

मार्क्सवाद के अनुसार मानवीय समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है , उनके अनुसार समाज में दो वर्ग हैं प्रथम पूंजीवादी वर्ग दूसरा मजदूर वर्ग । प्रथम वर्ग यानी पूंजीवादी वर्ग मजदूर वर्ग का शोषण करता है । उसके  श्रम से अधिक धन कमाया जाता है , और उन्हें श्रम से कम मजदूरी दी जाती है । 

🔹 मार्क्सवाद का उदय 19वीं 20वीं सदी के मध्य हुआ जब चिरसम्मत उदारवाद अपने चरमोत्कर्ष पर था । मार्क्सवाद का विचार अत्यधिक वैज्ञानिक होने के कारण कार्ल मार्क्स को वैज्ञानिक समाजवाद का जनक माना जाता है । 

कार्ल मार्क्स ने साम्यवादी घोषणा पत्र में क्रांति के लिए मजदूरों का आह्वान करते हुए कहा कि ' विश्व के मजदूरों एक हो जाओ ' ।


चिरसम्मत मार्क्सवाद

मार्क्सवाद की जो मान्यताएं स्वयं कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स के विचारों पर आधारित हैं उन्हें चिरसम्मत मार्क्सवाद कहा जाता है । यह मार्क्सवाद का दार्शनिक आधार है । यह वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत पर आधारित है । यह वर्ग विहीन एवं राज्य विहीन समाज की संकल्पना करता है ।

 

मार्क्सवाद का सिद्धांत: 


मार्क्सवाद का सिद्धांत द्वंदात्मक भौतिकवाद का सिद्धांत है ,जिसे कार्ल मार्क्स ने हीगल के सिद्धांतों से ग्रहण किया था । जिसने विकास की तीन अवस्थाओं का वर्णन किया है, वाद,प्रतिवाद और संवाद। मार्क्स ने हीगल के द्वंदवाद को स्वीकार किया परंतु दोनों के विचारों में कुछ मतभेद भी हैं । मार्क्स ने हीगल के अध्यात्मवाद की जगह पर भौतिकवाद का समर्थन किया ।

🔹मार्क्स का सिद्धांत वर्ग संघर्ष का सिद्धांत है , मार्क्स के अनुसार समाज का इतिहास रहा है  कि सामाजिक परिवर्तन संघर्ष के द्वारा ही संभव है । समाज दो वर्गों में विभाजित है, पूंजीपति वर्ग और श्रमिक वर्ग । श्रमिक वर्ग को एकजुट होकर  संघर्ष करना चाहिए जिससे पूंजीवादी व्यवस्था  समाप्त होगी तथा सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व स्थापित होगा ।

🔹 मार्क्स के अनुसार जैसे पूंजीवादी व्यवस्था का अंत होगा ,राज्य के रहने का औचित्य समाप्त हो जाएगा। इस प्रकार से मार्क्सवादी वर्गविहीन या राज्यविहीन समाज का सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं। 



मार्क्सवाद की प्रमुख विशेषताएँ


मार्क्सवाद एक सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक सिद्धांत है जो समाज को समझने और बदलने का ढाँचा प्रस्तुत करता है। इसकी मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं:

🔹  मार्क्सवाद के अनुसार समाज का विकास विचारों से नहीं, बल्कि भौतिक और आर्थिक परिस्थितियों से होता है। 

🔹 मार्क्सवाद समाज का इतिहास पूंजीवादी वर्ग एवं मजदूर वर्ग के संघर्ष का इतिहास है । यही संघर्ष सामाजिक परिवर्तन की प्रेरक शक्ति है। 

🔹मार्क्सवाद के अनुसार पूंजीवाद  समाज में असमानता, बेरोजगारी और आर्थिक संकट पैदा करता है जिससे पूंजीपतियों द्वारा मजदूर वर्ग का शोषण होता है।

🔹 उत्पादन के साधनों पर (कारखाने, जमीन और संसाधन) स्वामित्व निजी न होकर समाज के नियंत्रण में होने चाहिए।

🔹क्रांति का उद्देश्य मजदूर वर्ग की सत्ता स्थापित करना है जिससे पूंजीपति वर्ग के प्रभुत्व को समाप्त किया जा सके । 

🔹 मार्क्सवाद का अंतिम लक्ष्य ऐसे समाज की स्थापना करना है जहाँ कोई अमीर-गरीब का भेद न हो।


मार्क्सवाद–लेनिनवाद क्या है ?


व्लादिमीर लेनिन ने मार्क्सवादी क्रांति का व्यावहारिक प्रयोग किया । वर्ष 1917 की अक्टूबर क्रांति लेनिन की क्रांतिकारी रणनीति एवं सूझबूझ का परिणाम थी । लेनिन के अनुसार परिवर्तित स्थितियों में मार्क्स के सिद्धांत की व्याख्या भी परिवर्तित हो जाती है  । उनके अनुसार पूंजीवाद का विनाश अपरिहार्य है और साम्यवादी समाज की स्थापना होगी इसके लिए लेनिन ने दल को अत्यंत महत्व दिया । लेनिन ने अपनी पुस्तक 'What is to be done?'  में क्रांति का सिद्धांत दिया । उनके अनुसार सर्वहारा वर्ग में वर्ग चेतना का विकास स्वतः नहीं होगा सर्वहारा वर्ग में ही मजदूर चेतना का विकास स्वतः हो सकता है । सर्वहारा वर्ग में चेतना का विकास दल द्वारा होगा इसी दल द्वारा साम्यवादी क्रांति का मार्ग प्रशस्त होगा  । 

🔹 जॉर्ज प्लेखनोव जो रूसी मार्क्सवाद के पिता माने जाते थे , उन्होंने 'Socialism and The political struggle ' में लिखा कि रूस में साम्यवादी क्रांति की परिस्थितियां विद्वमान नहीं है , क्योंकि मार्क्स ने कहा था कि पूंजीवाद के विकास के बाद ही साम्यवादी क्रांति होगी, इसलिए रूस में पहले बुजुर्वावादी क्रांति की आवश्यकता है , इन्हें रूढ़िवादी मार्क्सवादी कहा जाता है । परंतु लेनिन ने प्लेखनोव के इन विचारों को अस्वीकार कर दिया । लेनिन के अनुसार परिवर्तित साम्राज्यवादी युग में दल द्वारा क्रांति होगी । उन्होंने साम्राज्यवाद को पूंजीवाद का सर्वोच्च रूप माना  । 

🔹 लेकिन के अनुसार पूंजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था के कारण साम्यवादी क्रांति को दोहरी हानि उठानी पड़ रही है । विकसित पूंजीवादी देशों में क्रांति नहीं हो रही है ,अल्प विकसित देशों का भी शोषण हो रहा है । लेनिन ने  साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष और पूंजीवाद विरोधी संघर्ष को एक साथ मिलने का प्रयास किया । उनके अनुसार सोवियत संघ की साम्यवादी क्रांति तभी स्थाई होगी जब पश्चिमी यूरोपीय देशों में क्रांति द्वारा इसको सहायता दी जाएगी । 

  🔹 स्टालिन के अनुसार, सोवियत संघ में साम्यवाद का बना रहना पश्चिमी पूंजीवादी देशों के समर्थन पर निर्भर नहीं है; बल्कि, उन्होंने माना कि  सोवियत संघ का समाज पहले ही वर्गहीन हो चुका है, लेकिन पूंजीवादी शक्तियों के कारण राज्य अभी भी अस्तित्व में है। 

🔹 आलोचना: जूलियस मार्तोव में लेनिन के बोल्शेविक तरीके का समर्थन नहीं किया और उन्होंने प्लेखनोव के विचारों के समर्थन करते हुए कहा कि रूस में पहले बुजुर्वा क्रांति होनी चाहिए । काटस्की ने भी लेनिन की पद्धति का समर्थन नहीं किया उन्होंने सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व के विचार पर भी आपत्ति व्यक्त की और लोकतांत्रिक तरीके का समर्थन किया । रोजा लक्जमबर्ग ने भी लेनिन की क्रांति के विचारों को स्वीकार नहीं किया  । 

 🔹सोवियत संघ, चीन (माओ काल), क्यूबा, वियतनाम आदि देशों की विचारधारा पर मार्क्सवाद–लेनिनवाद का गहरा प्रभाव रहा।



मार्क्सवादी राज्य का विचार: 

🔹मार्क्स के अनुसार उदारवादी राज्य की आलोचना :

 मार्क्सवादियों के अनुसार , आधार एवं अर्थव्यवस्था नामक संरचना राज्य सरकार के स्वरूप का निर्धारण करती है । इसलिए पूंजीपति वर्ग का उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण होता है इस तरह राज्य एवं सरकार पर उनका स्वाभाविक नियंत्रण हो जाता है । 

🔹 मार्क्स ने राज्य की आर्थिक व्याख्या की , उनके अनुसार राज्य पूंजीपतियों के हाथों में शोषण का एक यंत्र है । इसलिए उदारवादियों द्वारा प्रतिपादित राज्य की निष्पक्ष एवं कल्याणकारी स्वरूप को मार्क्सवाद ने अस्वीकार कर दिया । 

🔹 मार्क्सवादी राज्य को ना तो प्राकृतिक मानते हैं ना ही कल्याणकारी।  उसके अनुसार समाज दो वर्गों में विभाजित हो गया ,पूंजीपति वर्ग और मजदूर वर्ग। पूंजीपति वर्ग द्वारा निजी संपत्ति को बनाए रखने के लिए राज्य का निर्माण किया गया । 

🔹 राज्य की सापेक्ष स्वायत्तता का सिद्धांत :   मार्क्स ने आर्थिक निर्धारण वादी विचार के अलावा राज्य की सापेक्ष स्वायत्तता का विचार भी दिया जिसका अभिप्राय है कि राज्य एवं सरकार आर्थिक आधार से सापेक्ष रूप में स्वायत्त है अतः राज्य का निर्धारण केवल अर्थव्यवस्था द्वारा ही नहीं होता बल्कि अन्य सामाजिक वैचारिक तत्वों एवं सांस्कृतिक कार्यों से भी निर्धारित होता है  । 


मार्क्सवाद की आलोचना : 


मार्क्सवाद की आलोचना विभिन्न दृष्टिकोणों से की गई ,जिसमें से कुछ प्रमुख निम्नलिखित हैं । 

🔹मार्क्सवाद की आलोचना इस आधार पर की गई , कि उन्होंने राज्यविहीन, वर्गविहीन समाज का संकल्पना की थी ,इससे उनके उद्देश्य की अस्पष्टता दिखाई देती है ,क्योंकि मार्क्सवाद में आस्था रखने वाले देशों जैसे चीन में भी राज्य और विभिन्न वर्ग विद्यमान हैं। 

🔹 मार्क्सवाद ने सामाजिक परिवर्तन के लिए हिंसा का मार्ग अपनाने की बात कही, किन्तु हिंसा किसी भी मायने में सही नहीं है , अतः मार्क्सवाद के हिंसात्मक प्रवृति की कड़ी आलोचना की गई । 

🔹मार्क्सवाद के अनुसार सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व होना चाहिए , जोकि विभिन्न देशों में फैले तानाशाही स्वरूप के समान ही है। इस आधार पर भी मार्क्सवाद की आलोचना की गई ।

🔹मार्क्स ने अपने अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत में केवल श्रम को ही मूल्य के निर्धारण के आधार माना है ,जोकि स्वयं में ही त्रुटिपूर्ण है । क्योंकि मूल्य के निर्धारण में अन्य कारक भी निर्भर करते हैं ।

🔹 जिन देशों में मार्क्सवादी प्रणाली लागू हुई वह पर अक्सर आर्थिक जड़ता ,दमन एवं जीवन स्तर में गिरावट देखी गई ,इस प्रकार मार्क्सवाद की सर्वहारा वर्ग की क्रांति सार्वभौमिक रूप से सत्य नहीं हुई । 

    👉     निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि मार्क्सवाद ने शोषण , वर्ग संघर्ष और असमानता पर महत्वपूर्ण विमर्श किया परंतु मानव स्वभाव के प्रति उसका दृष्टिकोण अव्यावहारिक एवं एकांगी सिद्ध हुआ । 


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