ब्रिटिश शासन का भारत पर प्रभाव
(British rule impact on India in Hindi) :
🔹ब्रिटिश शासन का आर्थिक क्षेत्र में प्रभाव ।
🔹ब्रिटिश शासन का सामाजिक क्षेत्र में प्रभाव ।
🔹ब्रिटिश शासन का राजनीतिक क्षेत्र में प्रभाव ।
🔹 निष्कर्ष
भारतीय संविधान का निर्माण और उसकी औपनिवेशिक विरासत ।
ब्रिटिश शासन का औपनिवेशिक भारत पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कई क्षेत्रों में प्रभाव दिखाई पड़ता है । जिनमें से आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक क्षेत्र में प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण है।
ब्रिटिश शासन का आर्थिक क्षेत्र में प्रभाव :
स्वतंत्र भारत पर ब्रिटिश शासन का प्रभाव प्रत्येक क्षेत्र पर विद्यमान था । परंतु आर्थिक क्षेत्र में ब्रिटिश शासन ने भारत को अत्यधिक परिवर्तित किया। यह प्रभाव कृषि, उद्योग, परिवहन, संचार, प्रशासन,शिक्षा व्यवस्था आदि सभी रूपों में देखा जा सकता है । ब्रिटिश की उपनिवेशवादी आर्थिक संरचना ने भारत को गरीब और ब्रिटेन पर निर्भर बना दिया ।
🔹 भारतीय आर्थिक हित को पूर्णतः ब्रिटिश आर्थिक हितों के आधीन कर दिया गया था, भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य भाग विश्व पूंजीवादी व्यवस्था और शेष भाग घरेलू सामंतों और साहूकारों के द्वारा प्रयोग किया गया । कृषि और उद्योगों के विकास में बहुत कम निवेश किया गया। इसी व्यवस्था को दादा भाई नौरोजी ने निष्कासन के सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया।
🔹 भारत की आर्थिक नीतियों का निर्धारण ब्रिटेन में, ब्रिटेन के हितों के लिए किया गया । जिससे भारत में उद्योगों और कृषि क्षेत्र को राज्य द्वारा बहुत कम सहायता प्रदान की गई।
🔹 भारतीय प्रशासन, व्यापार और उद्योगों का नियंत्रण ब्रिटिश हितों को पूरा करने के लिए किया गया। भारत से वसूले गए करों ( Taxs) को ब्रिटिश सेवा एवं नागरिक प्रशासन के विकास पर खर्च किया गया। ब्रिटिश प्रशासन द्वारा भारतीय किसानों एवं नमक दोनों पर अधिक कर लगाया गया। जबकि नौकरशाहों, सामंतों एवं व्यापारियों पर नाम मात्र के कर लगाये गये ।
अतः उपनिवेशवादी व्यवस्था द्वारा भारत आर्थिक रूप से पूर्णतः पिछड़ गया । कृषि के क्षेत्र में विकास लगभग शून्य हो गया, जिससे खाद्यान्नों के उत्पादन में लगातार कमी आई । क्योंकि उपनिवेशवादी राज्य का लक्ष्य केवल भूमि से कर इकट्ठा करना था उसके विकास पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया गया ।
🔹 भारत में भूमिहीन किसानों की संख्या में वृद्धि हुई, जबकि जमीदारों के हितों को ध्यान में रखा गया। कृषि उत्पादन में वाणिज्यिक फसलों को बढ़ावा दिया गया क्योंकि उसकी मांग विश्व बाजार में अत्यधिक थी। भारत में कृषि के वाणिज्यिकरण ने पूंजीवादी खेती को बढ़ावा दिया, परिणाम स्वरुप बेहतर भूमि का उपयोग खाद्यान्न उद्योग के बजाय वाणिज्यिक खेती के लिए किया गया।
इसी समय विकसित देशों में कृषि का आधुनिकीकरण एवं कृषि के क्षेत्र में क्रांति हो रही थी । जबकि भारत में बाढ़ नियंत्रण एवं भूमि को मरुस्थलीकरण से बचाने के लिए किसी प्रकार का निवेश नहीं किया गया ।
🔹 कृषि के साथ-साथ उद्योगो की भी उपेक्षा हुई ,19वीं सदी में भारत के लघु उद्योग एवं हथकरघा उद्योग पूर्णता समाप्त हो गए । क्योंकि ब्रिटेन से आने वाली सस्ती वस्तुओं के सामने वे टिक नहीं पाए । यही ब्रिटिश उपनिवेशवाद की मूल नीति थी । इसके परिणाम स्वरुप इन उद्योगों में काम करने वाले बहुत व्यक्ति बेरोजगार हो गए ।
🔹 वर्ष 1950 में भारत अपनी आवश्यकता की मशीनों का 90% भाग आयात करता था । यह भारतीय अर्थव्यवस्था की पिछड़ी अवस्था का प्रमाण है ।
🔹 तत्कालीन समय में विद्यमान कोयले के उत्खनन, जूट ,बैंकिंग, बीमा और चाय के बागानों पर पूर्णतः ब्रिटिश उद्योगों का नियंत्रण था ।
🔹 ब्रिटिश उपनिवेशवाद का सकारात्मक पक्ष यह है कि इस समय में भारत में परिवहन एवं संचार की सुविधा का विकास ( विशेषतः रेल का निर्माण) किया गया । परंतु इसका प्रयोग उपनिवेशवादी व्यवस्था को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया, क्योंकि ब्रिटेन और अमेरिका में रेल के विकास द्वारा औद्योगिक क्रांति को बढ़ावा मिला परंतु भारत में ऐसा नहीं हुआ।
ब्रिटिश शासन का सामाजिक क्षेत्र में प्रभाव :
जैसे कि उल्लेखित है ब्रिटिश शासन का प्रभाव आर्थिक क्षेत्र में अत्यधिक था, उसका प्रभाव सामाजिक क्षेत्र में भी देखने को मिलता है । ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में प्रभावशाली घरेलू पूंजीपति वर्ग का विकास हुआ । जिनका स्वतंत्र, आर्थिक एवं वित्तीय आधार था । परंतु भारत में उद्योग एवं पूंजीवाद का विकास अत्यंत पिछड़ा था ।
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में गरीबी, बीमारी एवं भुखमरी फैली हुई थी अकाल की घटनाएं भारत के प्रत्येक भाग में देखी गई। वर्ष 1943 में बंगाल का अकाल महत्वपूर्ण था जिसमें लाखों लोगों की मृत्यु हुई । भारत में अनेक प्रकार की बीमारियां फैली हुई थी तथा स्वास्थ्य सुविधाएं बहुत कम थी । अनेक शहरों में बिजली नहीं थी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की कल्पना करना भी कठिन था ।
🔹 वर्ष 1951 में भारत में लगभग 84% लोग निरक्षर थे । महिलाओं में निरक्षरता दर 92% थी एवं प्रति व्यक्ति आय एवं जीवन स्तर भी निम्न था ।
ब्रिटिश शासन द्वारा उच्च शिक्षा के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया गया जिससे भारत में निम्नलिखित नकारात्मक परिणाम देखे गए ।
(i) शिक्षित और आम लोगों के बीच बहुत बड़ा अंतर हो गया ।
(ii) अंग्रेजी ने भारतीय भाषाओं के विकास को अवरोध कर दिया जिससे शिक्षा का प्रसार आम लोगों तक नहीं हो पाया ।
ब्रिटिश उपनिवेशवादी शिक्षा प्रणाली में तार्किक विश्लेषणात्मक क्षमता के विकास की उपेक्षा की गई तथा केवल रटने की विद्या पर बल दिया गया । इस प्रणाली में लड़कियों की शिक्षा व्यवस्था पर कोई जोर नहीं दिया गया । जिससे महिलाओं की शिक्षा दर और भी गिर गई ।
ब्रिटिश शासन का राजनीतिक क्षेत्र में प्रभाव :
ब्रिटिश उपनिवेशवादी शासन भारत के लिए राजनीतिक रूप से एक विरोधाभासी विरासत (Paradoxical Legacy) छोड़ गया। क्योंकि इसने एक तरफ अधिनायकवादी , निरंकुशतावादी , नस्लीय भेदभाव एवं विभाजनकारी नीतियों का निर्माण किया। तथा दूसरी तरफ इसकी नीतियों में कुछ उदारवादी एवं विधि के शासन से संबंधित तत्व भी विद्यमान हैं।
ब्रिटिश शासन की विधियां दमनकारी थी जिनका निर्माण भारतीयो द्वारा नहीं किया गया, न ही इनके निर्माण में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन किया गया । परिणाम स्वरूप सिविल सेवकों एवं पुलिस के हाथ में असीमित शक्तियां दी गई । उनके शासन में कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्यों का विभाजन भी नहीं था ।
🔹 उपनिवेशवादी वैधानिक व्यवस्था विधि के समक्ष समानता पर आधारित थी । परंतु वास्तविक रूप में न्यायपालिका द्वारा भेदभावपूर्ण व्यवहार किया गया। न्यायाधीशों ने सदैव अंग्रेजों का पक्ष लिया तथा न्याय की प्रणाली को अधिक खर्चीली व जटिल बनाया गया जोकि समाज के अमीर वर्गों के लिए उपयुक्त थी ।
ब्रिटिश शासन का सकारात्मक पक्ष यह था कि पहली बार भारत में कानून का शासन (Rule of Law) की अवधारणा आई।
🔹 ब्रिटिश उपनिवेशवादी शासन में व्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सामान्य समय में तो स्वीकार किया गया, लेकिन जन आंदोलन के दौरान इनको पूर्णतः समाप्त कर दिया गया । वर्ष 1857 के बाद इन स्वतंत्रताओं के अत्यधिक अवहेलना हुई ।
🔹 वर्ष 1858 के बाद ब्रिटिश शासन द्वारा भारतीयों को क्रमिक रूप में संवैधानिक और आर्थिक सुविधा प्रदान की गई परंतु ब्रिटिश राजनेताओं और प्रशासकों ने भारत में प्रतिनिधिवादी लोकतंत्र की स्थापना का पूर्ण विरोध किया ।
ब्रिटेनवासियों ने भारत के लिए नरम अधिनायक वाद का समर्थन किया, उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास और संस्कृति के लिए यही उपयुक्त है लेकिन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलनकारीयो के दबाव के कारण इन्होंने केंद्र और राज्य स्तर पर विधायिकाओं का निर्माण किया तथा चुनाव का प्रयोग किया गया ।
🔹 वर्ष 1919 के बाद केवल 3% भारतीयों को मतदान का अधिकार था जो की 1935 के बाद 15% भारतीयों को यह अधिकार प्रदान किया गया। इसलिए इन विधायिकाओ के निर्माण के बाद भी ब्रिटिश शासन का पूर्ण नियंत्रण भारत पर बना रहा । इसका सकारात्मक प्रभाव यह था कि भारतीयों को लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के अंतर्गत उनकी संस्थाओं में कार्य करने का अनुभव हुआ जिससे उपनिवेशवादी व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष प्रारंभ हुआ ।
🔹 ब्रिटिश शासन द्वारा ' बांटो और राज्य करो ' की नीति का प्रयोग किया गया, ब्रिटिश शासन ने एक जाति की दूसरी जाति से, एक वर्ग को दूसरे वर्ग से, एक धर्म को दूसरे धर्म से तथा राजाओं और जमीदारों को राष्ट्रीय आंदोलनकारी से लड़ा दिया। इन विभाजनकारी नीतियों का अंतिम परिणाम भारत की सांप्रदायिक विभाजन के रूप में हुआ ।
🔹ब्रिटिशों ने भारत में एक व्यवस्थित नौकरशाही तंत्र विकसित किया। परंतु आई. सी. एस. ( ICS) अधिकारी मूलत ब्रिटिश साम्राज्य की एजेंट थे । इस नौकरशाही को स्वतंत्र और ईमानदार माना जाता था जबकि वास्तविक रूप में इनका दृष्टिकोण अत्यधिक रूढ़िवादी एवं संकीर्ण था ।
निष्कर्ष ( Conclusions):
ब्रिटिश शासन भारत के लिए केवल औपनिवेशिक शोषण का काल नहीं था, बल्कि यह एक ऐसा दौर भी था जिसने आधुनिक भारत की संस्थागत संरचना को गहराई से प्रभावित किया। भारतीय संविधान की कई व्यवस्थाएँ — जैसे संसदीय शासन प्रणाली, विधि का शासन, एकल नागरिकता, स्वतंत्र न्यायपालिका और संघीय ढाँचा — प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ब्रिटिश संवैधानिक परंपराओं से प्रेरित हैं।
आर्थिक क्षेत्र में जहाँ एक ओर ब्रिटिश नीतियों ने भारत को औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में बदलकर गरीबी, कुटीर उद्योगों के पतन और ‘धन के निष्कासन’ जैसी समस्याएँ दीं, वहीं दूसरी ओर आधुनिक अवसंरचना, वाणिज्यिक कृषि और परिवहन तंत्र की शुरुआत भी इसी काल में हुई।
सामाजिक क्षेत्र में अंग्रेजी शिक्षा, सामाजिक सुधार आंदोलनों को अप्रत्यक्ष समर्थन और आधुनिक विचारों के प्रसार ने भारतीय समाज में नई जागरूकता पैदा की, हालांकि उनकी नीतियों ने विभाजनकारी प्रवृत्तियों को भी बढ़ावा दिया।
राजनीतिक क्षेत्र में ब्रिटिश शासन दमनकारी था, परंतु इसी काल में प्रशासनिक संस्थाओं का विकास, विधायी परिषदों की स्थापना, स्थानीय स्वशासन की शुरुआत और संवैधानिक विकास की प्रक्रिया ने भारत को लोकतांत्रिक शासन की दिशा में अग्रसर किया।
अतः ब्रिटिश शासन की विरासत विरोधाभासी (Paradoxical) रही , उसने भारत का शोषण भी किया और अनजाने में आधुनिक, लोकतांत्रिक और संवैधानिक भारत की नींव भी रख दी।
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