🔹जॉन स्टुअर्ट मिल (1806-1873 ) का दर्शन
(John Stuart Mill philosophy in Hindi)
🔹जे एस मिल का उपयोगितावाद सिद्धांत (John Stuart Mill utilitarian theory in Hindi)
🔹जॉन स्टुअर्ट मिल का स्वतंत्रता सिद्धांत ।
🔹जे. एस. मिल का लोकतंत्र का विचार
(J.S.Mill’s Idea of Democracy)
🔹 संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर।
जॉन स्टुअर्ट मिल (1806-1873 ) का दर्शन (John Stuart Mill philosophy in Hindi) :
जॉन स्टुअर्ट मिल का जन्म लंदन में 20 मई 1806 ई. को हुआ था । मिल को पहला व्यक्तिवादी एवं अंतिम उपयोगितावादी कहा जाता है । उन्होंने अपने निबंध
' Essay on Liberty ' में अपने स्वतंत्रता संबंधी विचारों को प्रस्तुत किया। जे एस मिल ने लोकतंत्र का जोरदार समर्थन किया। उन्होंने अपनी पुस्तक Considerations on Representative Government (1861) में महिलाओं के प्रतिनिधित्व संबंधी विचारों को प्रस्तुत किया तथा उनका समर्थन किया ।
जे एस मिल ने पहली बार कल्याणकारी राज्य का सैद्धांतिक प्रतिपादन किया । उन्होंने अहस्तक्षेपवादी राज्य के बजाय हस्तक्षेपवादी राज्य का समर्थन किया । उन्होंने कल्याणकारी राज्य संबंधी विचारों को अपनी रचना ' Principles of Political Economy में लिखा।
सेबाइन के अनुसार, मिल पहले उदारवादी विचारक है जिसने व्यक्ति एवं राज्य के मध्य समाज नामक तीसरे तत्व की खोज की । जे एस मिल, डी टाकविले एवं आगस्त कामटे के विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे।
निष्कर्षतया यह कहा जा सकता है कि जे. एस. मिल (John Stuart Mill) का दर्शन मुख्य रूप से उपयोगितावाद (Utilitarianism), स्वतंत्रता (Liberty) और व्यक्तिवाद पर आधारित है। उनका दर्शन नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक विचारों में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।तथा उनके विचारों में लोकतंत्र का पूर्ण समर्थन दिखाई देता है।
जे एस मिल का उपयोगितावाद सिद्धांत (John Stuart Mill utilitarian theory in Hindi) :
जान स्टुअर्ट मिल को पहला व्यक्तिवादी और अंतिम उपयोगितावादी कहा जाता है । उन्हें पहला व्यक्तिवादी इसलिए कहा जाता है क्योंकि उसने व्यक्ति की व्यक्तित्व के विकास का जोरदार समर्थन किया । उन्हें अंतिम उपयोगिता वादी इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अपने विचारों का आरंभ उपयोगितावाद से किया । परंतु उन्होंने उपयोगितावाद में कुछ संशोधन भी किया ।
जे एस मिल के अनुसार, “वह कार्य नैतिक है जो अधिकतम व्यक्तियों के लिए अधिकतम सुख उत्पन्न करे "। इस आधार पर उन्होंने उपयोगितावाद का सिद्धांत प्रस्तुत किया। उनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति का मूल उद्देश्य अधिकतम सुख की प्राप्ति करना है,व्यक्ति का वह कार्य ही सही है जिसमें ज्यादा से ज्यादा सुख प्राप्त हो तथा जो भी चीज सुख प्रदान करें वह उपयोगी होगी ।
जे एस मिल ने बेंथम के विचारों को संशोधित कर दिया क्योंकि बेंथम ने कहा था कि सुख मात्रात्मक होता है ,यह शारीरिक होता है इसलिए सुख की ज्यादा से ज्यादा मात्रा प्राप्त करनी चाहिए । परंतु जे एस मिल के अनुसार सुख दो प्रकार का होता है
(i) नैतिक ,बौद्धिक ( उच्चतर सुख)
(ii) भौतिक या शारीरिक सुख ( निम्नतर सुख )
मिल के अनुसार मानव होने का अर्थ उच्चतर सुखों की प्राप्ति करना है। उनके अनुसार, “संतुष्ट सूअर होने से असंतुष्ट मनुष्य होना बेहतर है।”
🔹 जे एस मिल ने सुख के बजाय स्वतंत्रता को साध्य माना। उन्होंने बेन्थम के विचार का खंडन किया क्योंकि बेन्थम ने इतिहास, परंपरा एवं धर्म जैसे तथ्यों को अवहेलना की थी। परंतु जे एस मिल ने परंपरा, इतिहास एवं संस्कृति का विशेष ध्यान दिया इसलिए वेपर ने उन्हें ऐतिहासिक सापेक्षवादी कहा।
इस प्रकार जे एस मिल ने व्यक्ति के नैतिक विकास पर सर्वाधिक महत्व दिया । जबकि इससे पहले के विचारकों ने व्यक्ति के भौतिक विकास पर बल दिया था ।
जॉन स्टुअर्ट मिल का स्वतंत्रता सिद्धांत :
जे. एस. मिल (John Stuart Mill) का स्वतंत्रता संबंधी विचार उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “On Liberty” (1859) में मिलता है। मिल की स्वतंत्रता का मूलभूत आशय विचार, अभिव्यक्ति व भाषण की पूर्ण स्वतंत्रता से है । उन्होंने वाक् एवं अभिव्यक्ति की निरपेक्ष स्वतंत्रता पर बल दिया ।
मिल के अनुसार प्रत्येक प्रकार का प्रतिबंध बुरा है प्रतिबंधों का अभाव ही स्वतंत्रता है । मिल की स्वतंत्रता की संकल्पना को नकारात्मक स्वतंत्रता कहा जाता है ।
उनके अनुसार, व्यक्ति अपने मन एवं शरीर का स्वामी है। तथा उसकी स्वतंत्रता का हनन सबसे अधिक राज्य या सरकार नहीं बल्कि बहुमत समाज ही करता है ।
🔹 यद्यपि की मिल ने अपनी रचना on liberty मे कहा कि प्रतिबंधों का अभाव ही स्वतंत्रता है । परंतु वह संवैधानिक शासन का समर्थन करते हैं। तथा व्यक्तिवादी विचारधारा के पक्षधर हैं।
🔹 मिल ने व्यक्ति को विवेकशील और तार्किक मानते हुए निम्नलिखित स्वतंत्रताओं की बात कही ।
(i) व्यक्ति को विचारों की स्वतंत्रता है।
(ii) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है ।
(iii) समूह बनाने की स्वतंत्रता है ।
(iv) कार्य करने के स्वतंत्रता है।
इनमें से सर्वाधिक बल वह विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर देते हैं ।
🔹 जे एस मिल ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपने विचार व्यक्त करें क्योंकि आज तक कोई पूर्ण विचार या पूर्ण सत्य नहीं प्राप्त हो सका है। इसलिए विचार विमर्श को बढ़ावा देने की आवश्यकता है । उनके अनुसार, यदि कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि यह विचार एकमात्र सत्य है तो यह निरपेक्ष है एवं स्वतंत्रता के लिए खतरा बन जाता है क्योंकि इसके द्वारा विरोधी विचारों को दबाने का प्रयास किया जाता है ।
🔹 उनके अनुसार कोई व्यक्ति सत्य के ज्ञान का पूर्ण दावा नहीं कर सकता । अतः विचार विमर्श के द्वारा ही सत्य का ज्ञान होता है । यदि एक व्यक्ति भी समुचित सभ्यता के खिलाफ बोले तो उसे भी चुप नहीं कराया जाना चाहिए ।
🔹 स्वतंत्रता पर प्रतिबंध :
जे एस मिल के अनुसार स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है जब आप दूसरे की समान स्वतंत्रता का हनन करें इसे Harm Principle कहा जाता है । नागरिक कर्तव्य की भूमिका में होने पर, प्रतिबंध लगाया जा सकता है जैसे कार्य पर तैनात सिपाही को कार्य करने के लिए प्रतिबंधित किया जा सकता है। देश पर बाह्य आक्रमण के समय स्वतंत्रता को प्रतिबंधित किया जा सकता है ।
🔹 मिल के अनुसार व्यक्ति की व्यक्तित्व के विकास के लिए स्वतंत्रता आवश्यक है तथा इससे सभ्यता का विकास भी अधिक होगा ।
🔹 मिल ने कार्य करने की स्वतंत्रता पर जोर दिया था परंतु उन्होंने कार्य को दो भागों में विभाजित किया ।
स्वयं परक कार्य - इन पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता जो केवल स्वयं व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करें ।
अन्य परक कार्य - इन पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है जो समाज में अन्य व्यक्तियों को प्रभावित करें ।
🔹 आलोचना:
बार्कर के अनुसार मिल की स्वतंत्रता खोखली और उसका व्यक्तिवाद अमूर्त है क्योंकि वह स्वतंत्रता प्राप्त करने हेतु उपाय को नहीं बताता है और अधिकारों की कोई व्यवस्था नहीं करता ।
बोसांके के अनुसार मिल का व्यक्तिवाद अनालोचित व्यक्तिवाद है जो अनालोचित समूह वाद की ओर झुकाव की प्रकृति रखता है ।
जे. एस. मिल का लोकतंत्र का विचार
(J.S.Mill’s Idea of Democracy) :
जे.एस. मिल (John Stuart Mill) का लोकतंत्र संबंधी विचार उनकी प्रसिद्ध रचना “Considerations on Representative Government” (1861) में मिलता है। उनका लोकतंत्र का विचार संसदीय या प्रतिनिधिवादी लोकतंत्र का है । इसे परिचर्चात्मक लोकतंत्र भी कहा जाता है । उन्होंने रूसो के प्रत्यक्ष लोकतंत्र एवं बेन्थम के ' एक व्यक्ति, एक मत' की मान्यता को अस्वीकृत कर दिया । उन्होंने बहुल मतदान का समर्थन किया । उन्होंने लोकतंत्र को शिक्षा प्रणाली और जीवन शैली के रूप में चित्रित किया ।
🔹 जे एस मिल के अनुसार, सच्चा लोकतंत्र निम्नलिखित है ।
(i) लोकतंत्र में बुद्धिमान और गुणी व्यक्तियों का सम्मान किया जाना चाहिए इसलिए उसने लॉर्ड सभा को बनाए रखने का समर्थन किया ।
(ii) वह खुले मतदान का समर्थन था ।
(iii) उसने आनुपातिक प्रतिनिधित्व का समर्थन किया जिससे अल्पसंख्यकों का भी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।
(iv) मिल महिलाओं के मताधिकार का सबसे बड़ा समर्थक था, उसने महिलाओं को भी प्रतिनिधित्व के अधिकार का समर्थन किया । इसका विचार उसने अपनी रचना The subjection of Women (1869) में किया ।
(v) जे एस मिल ने बहुल मतदान का समर्थन किया तथा शिक्षित और संपत्तिशाली व्यक्तियों को एक से अधिक मत देने का समर्थन किया।
(vi) वह सांसदों के वेतन का समर्थक नहीं था ।
🔹 मैकफर्सन ने मिल के लोकतंत्र को उदारवादी लोकतंत्र के विकासात्मक मॉडल में रखा है ।
🔹 आलोचना - वेपर के अनुसार, मिल ने मतदान को एक कर्तव्य कहा । वेपर ने मिल को अनिच्छुक लोकतंत्रवादी कहा ,क्योंकि वह सभी व्यक्तियों को समान मत देने का समर्थन नहीं करता। इसके अलावा उसने यह प्रतिपादित किया कि लोकतांत्रिक शासन सभी समाजों के लिए उपयुक्त नहीं है।
👉 जे एस मिल अपने मित्र डी टाकविले की रचना Democracy in America (1835) से अत्यधिक प्रभावित थे। टाकविले के अनुसार, अमेरिका में लोकतांत्रिक शासन के बावजूद व्यक्तियों की स्वतंत्रता का दमन हो रहा है । क्योंकि अमेरिका में बहुमत पर निरंकुशता व्याप्त है । मिलने तक मिला के विचारों का पूर्णता समर्थन किया और कहा कि लोकतांत्रिक शासन में सभी के स्वतंत्रता की गारंटी नहीं है लोकतांत्रिक शासन में अशिक्षित गरीब लोगों का प्रभाव बढ़ जाता है, तथा संपत्तिशील व्यक्तियों की स्वतंत्रता के लिए खतरा बन जाते हैं ।
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर:
प्रश्न 1. जॉन स्टुअर्ट मिल किस दर्शन के प्रमुख प्रवर्तक हैं?
उत्तर: जे एस मिल उपयोगितावाद (Utilitarianism) के प्रमुख प्रवर्तक माने जाते हैं।
प्रश्न 2. जे. एस. मिल के उपयोगितावाद का मूल सिद्धांत क्या है?
उत्तर: जे एस मिल के अनुसार , वह कार्य नैतिक है जो अधिकतम व्यक्तियों के लिए अधिकतम सुख उत्पन्न करे।
प्रश्न 3. जे. एस. मिल और बेंथम के उपयोगितावाद में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: बेंथम सुख को मात्रात्मक, जबकि मिल सुख को गुणात्मक मानते हैं। तथा सुख को दो भागों उच्च व निम्न सुख में विभाजित करते हैं।
प्रश्न 4.“उच्च सुख” और “निम्न सुख” से मिल का क्या तात्पर्य है?
उत्तर: उच्च सुख: बौद्धिक, नैतिक, मानसिक सुख
निम्न सुख: शारीरिक, इंद्रिय सुख
प्रश्न 5. “Better to be Socrates dissatisfied than a fool satisfied” कथन किसका है?
उत्तर: जॉन स्टुअर्ट मिल।
प्रश्न 6. जॉन स्टुअर्ट मिल की स्वतंत्रता सिद्धांत का आधार क्या है?
उत्तर: हानि सिद्धांत (Harm Principle)।
प्रश्न 7. हानि सिद्धांत (Harm Principle) क्या कहता है?
उत्तर: राज्य या समाज व्यक्ति की स्वतंत्रता में तभी हस्तक्षेप कर सकता है जब उसका कार्य दूसरों को हानि पहुँचाए।
प्रश्न 8.“On Liberty” पुस्तक किसने और कब लिखी?
उत्तर: जॉन स्टुअर्ट मिल ने 1859 में लिखी।
प्रश्न 9. मिल के अनुसार स्वतंत्रता के प्रमुख रूप कौन-से हैं?
उत्तर:
विचार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
आचरण की स्वतंत्रता
संगठन बनाने की स्वतंत्रता
प्रश्न 10. मिल किस प्रकार के लोकतंत्र के समर्थक थे?
उत्तर: मिल प्रतिनिधि लोकतंत्र (Representative Democracy) का समर्थन करते हैं।
प्रश्न 11.आनुपातिक प्रतिनिधित्व का समर्थन मिल ने क्यों किया?
उत्तर: अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए।
प्रश्न 12.बहुल मताधिकार (Plural Voting) से मिल का क्या आशय था?
उत्तर:अधिक शिक्षित और शक्तिशाली व्यक्तियों को एक से अधिक मत देने का सुझाव।
प्रश्न 13. जॉन स्टुअर्ट मिल महिला अधिकारों के बारे में क्या विचार रखते थे?
उत्तर: वे महिला मताधिकार और लैंगिक समानता के समर्थक थे। उन्होंने अपनी रचना “The Subjection of Women” में महिलाओं को सार्वजनिक क्षेत्र में समानता के लिए जोरदार समर्थन किया।
प्रश्न 14. मिल का उपयोगितावाद किस प्रकार का है?
उत्तर:सामाजिक और नैतिक उपयोगितावाद।
प्रश्न 15. मिल के दर्शन की मुख्य आलोचना क्या है?
उत्तर: सुख को मापना कठिन
अल्पसंख्यक अधिकारों की अनदेखी
अभिजात्यवाद का आरोप
प्रश्न 16. जॉन स्टुअर्ट मिल का दर्शन किन क्षेत्रों को प्रभावित करता है?
उत्तर: नैतिक दर्शन, राजनीतिक दर्शन, लोकतंत्र, मानव अधिकार और स्वतंत्रता।
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