हीगल का दर्शन
(Hegel philosophy in Hindi)
🔹हीगल कौन थे ? उनका जीवन परिचय बताइए ।
🔹हीगल का द्वंदात्मक भौतिकवाद क्या है?
🔹हीगल की नागरिक समाज की संकल्पना
🔹हीगल का स्वतंत्रता संबंधी विचार ।
🔹हीगल की प्रमुख रचनाएं ।
🔹 संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर।
हीगल कौन थे ? उनका जीवन परिचय बताइए।
जर्मन आदर्शवादी दार्शनिक हीगल का जन्म 1770 ईस्वी में जर्मनी के स्टुटगार्ट नामक नगर में हुआ था ।उनका पूरा नाम जॉर्ज विल्हेल्म फ्रेडरिक हीगल (Georg Wilhelm Friedrich Hegel) है । हीगल ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा स्टुटगार्ट में प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने जर्मनी में स्थित ट्यूबिंगन विश्वविद्यालय (University of Tubingen) में धर्मशास्त्र और दर्शन का अध्ययन किया। वहां पर इनकी मुलाकात शेलिंग और होल्डरलिन जैसे विचारकों से हुई । और उन्होंने इतिहास, समाज, राज्य और आत्मा (Spirit) को दार्शनिक दृष्टि से समझने का प्रयास किया।
हीगल का दर्शन मुख्य रूप से द्वंद्वात्मक पद्धति (चिंतन पद्धति )पर आधारित है। वह जर्मनी की आदर्शवादी परंपरा से प्रभावित थे । उन्होंने The phenomenology of spirit (1807) एवं Elements of the philosophy of Right (1821) नामक रचना लिखी।
हीगल के समय का जर्मनी सामंतवादी व्यवस्था पर आधारित था तथा जर्मनी पर औद्योगिक क्रांति का प्रभाव नहीं था । जर्मनी को ब्रिटेन ,फ्रांस और स्पेन जैसे शक्तिशाली राष्ट्रों से खतरा था , इसका असर हीगल के दर्शन पर पड़ा। इसलिए वह जर्मनी की एकता निर्मित करना चाहते थे एवं एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाना चाहते थे ।
हीगल का प्रभाव कार्ल मार्क्स (Marxism) एवं
एंगेल्स जैसे विचारकों पर पड़ा । सन 1831 में जर्मनी के बर्लिन शहर में उनकी मृत्यु हो गई।
हीगल का द्वंदात्मक भौतिकवाद क्या है?
हीगल को दार्शनिक दृष्टि से द्वंद्वात्मक भौतिकवाद नहीं, बल्कि द्वंद्वात्मक आदर्शवाद (Dialectical Idealism) या द्वंदात्मक पद्धति का प्रवर्तक माना जाता है। हीगल के विचारों से प्रभावित होकर बाद में कार्ल मार्क्स और एंगेल्स ने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का विकास किया, उन्होंने हीगल की द्वंद्वात्मक पद्धति को अपनाकर उसे भौतिक आधार प्रदान किया। फिर भी सामान्य शैक्षणिक भाषा में “हीगल का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद” कहकर वास्तव में हीगल की द्वंद्वात्मक पद्धति को समझाया जाता है।
हीगल का द्वंद्वात्मक सिद्धांत :
हीगल पहले विचारक हैं जिन्होंने राजनीति का अध्ययन इतिहास के माध्यम से किया तथा इतिहास के दर्शन का निर्माण किया । उनके अनुसार संसार, इतिहास व विचार स्थिर नहीं है बल्कि निरंतर परिवर्तनशील हैं। उन्होंने वाद, प्रतिवाद एवं संवाद के माध्यम से व्यक्ति, समाज, राज्य व इतिहास सभी के विकास का विश्लेषण किया । उनके अनुसार संवाद, वाद- प्रतिवाद दोनों से श्रेष्ठ है क्योंकि वाद से प्रतिवाद के विकास का मूल आधार विरोध है जबकि संवाद में वाद- प्रतिवाद दोनों से अच्छे तत्वों का समन्वय होता है ।
हीगल ने वाद प्रतिवाद की द्वंदात्मक प्रक्रिया का प्रयोग करते हुए राज्य के विकास को परिभाषित किया । उनके अनुसार राज्य का विकास परिवार से आरंभ होता है। परिवार से नागरिक समाज तथा नागरिक समाज से राज्य का विकास होता है ।
परिवार - नागरिक समाज - राज्य
हीगल के अनुसार परिवार का मूल तत्व प्रेम तथा स्नेह होते हैं तथा यह व्यक्तिगत परार्थवाद का क्षेत्र होता है । जबकि नागरिक समाज का मूल तत्व स्वार्थ तथा प्रतिस्पर्धा होते हैं तथा यह सार्वभौमिक स्वार्थवाद का क्षेत्र होता है । राज्य में परिवार का परार्थवाद तथा नागरिक समाज का सार्वभौमिक स्वार्थवाद दोनों का सम्मिश्रण होता है। अतः राज्य सार्वभौमिक परार्थवाद का क्षेत्र होता है।
🔹 महत्व - (i)हीगल का द्वंदात्मक सिद्धांत परिवर्तन और विकास की वैज्ञानिक व्याख्या करता है ।
(ii) हीगल ने इतिहास को घटनाओं का संयोग नहीं माना, बल्कि उसे तार्किक और उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया बताया ।
(iii)कार्ल मार्क्स और एंगेल्स ने हीगल के द्वंद्वात्मक ढांचे को अपनाया और उसे भौतिकवादी आधार दिया। इस प्रकार द्वंद्ववाद ने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और ऐतिहासिक भौतिकवाद के विकास में निर्णायक भूमिका निभाई ।
(iv) हीगल का द्वंद्ववाद किसी भी विचार को अंतिम सत्य नहीं मानता। हर विचार का विरोध और परीक्षण आवश्यक है। इससे आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking) को बढ़ावा मिला और दर्शन को जड़ता से बाहर निकाला।
हीगल की नागरिक समाज की संकल्पना:
हीगल वह पहले विचारक हैं जिन्होंने राज्य व परिवार के मध्य नागरिक समाज की संकल्पना प्रस्तुत की । उनके अनुसार नागरिक समाज के द्वारा प्रशासनिक न्यायिक व वैधानिक कार्य संपादित होंगे । उन्होंने ईश्वर की जगह सार्वभौमिक आत्मा शब्द का प्रयोग किया ।
हीगल के अनुसार राज्य और नागरिक समाज के मध्य संबंध परस्पर पूरक और विरोधाभासी दोनों है । परस्पर पूरक इसलिए है क्योंकि नागरिक समाज के बिना राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती , नागरिक समाज में ही प्रशासनिक, विधायी और न्यायिक कार्य संपन्न किए जाते हैं। विरोधाभासी इसलिए हैं क्योंकि नागरिक समाज प्रतिस्पर्धा और स्वार्थ का क्षेत्र है, जबकि राज्य पूर्ण नैतिकता तथा सार्वभौमिक परार्थवाद का क्षेत्र है ।
हीगल का स्वतंत्रता संबंधी विचार :
हीगल ने अपने स्वतंत्रता संबंधी विचारों को अपनी रचना " Elements of the philosophy of Right" (1821) में दिया। उनकी स्वतंत्रता का अभिप्राय, सामाजिक कर्तव्यों के रूप में है। वह स्वतंत्रता को केवल मनमानी या बंधनों की अनुपस्थिति नहीं मानते, बल्कि उसे तर्कसंगत और नैतिक जीवन से जोड़ते हैं।
🔹हीगल के अनुसार स्वतंत्रता का अर्थ है “अपने आप के अनुरूप होना” अर्थात व्यक्ति वही करे जो तर्क(Reason) और नैतिकता (Ethical life) के अनुरूप हो। यदि व्यक्ति केवल अपनी इच्छाओं के अनुसार कार्य करता है, तो वह वास्तव में स्वतंत्र नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं का दास होता है। इस प्रकार हीगल नकारात्मक स्वतंत्रता (जो केवल बंधनों की अनुपस्थिति है) को अपर्याप्त मानते हैं और सकारात्मक स्वतंत्रता पर बल देते हैं, जिसमें व्यक्ति तर्कसंगत नियमों को स्वेच्छा से स्वीकार करता है।
🔹हीगल का स्वतंत्रता संबंधी प्रसिद्ध कथन है:
“विश्व इतिहास स्वतंत्रता की चेतना की प्रगति है।” अर्थात विश्व के इतिहास का विकास , स्वतंत्रता के परंपरागत विस्तार के कारण ही संभव हुआ है ।
🔹हीगल स्वतंत्रता का सर्वोच्च रूप राज्य के अंदर ही मानते हैं। उनके अनुसार राज्य की आज्ञा का पालन करना ही स्वतंत्रता है । राज्य कानून का निर्माण करता है तथा कानून व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है और व्यक्ति अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों को भी स्वीकार करता है। इस प्रकार व्यक्ति की व्यक्तिगत इच्छा, सार्वभौमिक इच्छा से सामंजस्य स्थापित करती है और व्यक्ति वास्तविक स्वतंत्रता प्राप्त करता है।
🔹 आलोचना - हीगल के स्वतंत्रता संबंधी विचार की आलोचना यह कहकर की गई कि वे राज्य को अत्यधिक महत्त्व देते हैं। फिर भी उनका योगदान यह है कि उन्होंने स्वतंत्रता को अनुशासन, तर्क और नैतिकता से जोड़कर एक गहरी दार्शनिक समझ प्रदान की।
हीगल की प्रमुख रचनाएं :
🔹The phenomenology of spirit (1807) 🔹Elements of the philosophy of Right (1821)
🔹Lectures on the philosophy of history (1857)
🔹The science of Logic (1816)
🔹The encyclopedia of the Philosphical sciences (1817)
🔹The German constitution (1802)
🔹Lectures on Aesthetics (1818)
🔹Lectures on the philosophy of Religion (1827)
संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. हीगल कौन थे?
उत्तर: हीगल (Georg Wilhelm Friedrich Hegel) जर्मन आदर्शवादी दार्शनिक थे, जिन्होंने द्वंद्वात्मक पद्धति, आत्मा का दर्शन और स्वतंत्रता का सिद्धांत प्रस्तुत किया।
प्रश्न 2. हीगल का दर्शन किस पर आधारित है?
उत्तर: हीगल का दर्शन द्वंद्वात्मक आदर्शवाद (Dialectical Idealism) पर आधारित है।
प्रश्न 3. द्वंद्वात्मक सिद्धांत के तीन चरण कौन से हैं?
उत्तर: थीसिस → एंटीथीसिस → सिंथेसिस
अथवा वाद - प्रतिवाद - संवाद
प्रश्न 4. क्या हीगल द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के प्रवर्तक थे?
उत्तर:नहीं। हीगल द्वंद्वात्मक आदर्शवादी थे।द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का विकास कार्ल मार्क्स और एंगेल्स ने किया।
प्रश्न 5. हीगल के अनुसार इतिहास क्या है?
उत्तर:
इतिहास स्वतंत्रता की चेतना की प्रगति है।
प्रश्न 6 . हीगल के अनुसार स्वतंत्रता का सही अर्थ क्या है?
उत्तर: स्वतंत्रता का अर्थ है—
तर्कसंगत नियमों के अनुसार स्वेच्छा से कार्य करना।
प्रश्न 7. हीगल के अनुसार वास्तविक स्वतंत्रता कहाँ प्राप्त होती है?
उत्तर: राज्य (State) में।
प्रश्न 8. हीगल ने राज्य को क्या माना?
उत्तर: राज्य को नैतिक जीवन (Ethical Life / Sittlichkeit) की सर्वोच्च अभिव्यक्ति माना।
प्रश्न 9. हीगल के अनुसार नागरिक समाज (Civil Society) क्या है?
उत्तर: नागरिक समाज वह क्षेत्र है जहाँ व्यक्ति अपने निजी हितों की पूर्ति करता है और जहाँ आर्थिक संबंध विकसित होते हैं।
प्रश्न 10 . परिवार, नागरिक समाज और राज्य में क्या संबंध है?
उत्तर: परिवार → भावनात्मक एकता
नागरिक समाज → व्यक्तिगत स्वार्थ
राज्य → सार्वभौमिक हित
प्रश्न 11. हीगल का ‘Absolute Spirit’ क्या है?
उत्तर: Absolute Spirit आत्मा की वह अवस्था है जहाँ आत्मा कला, धर्म और दर्शन के माध्यम से स्वयं को पूर्णतः पहचानती है।
प्रश्न 12. हीगल के अनुसार कला, धर्म और दर्शन का क्रम क्या है?
उत्तर: कला → धर्म → दर्शन
(दर्शन सर्वोच्च स्तर है)
प्रश्न 13. हीगल के दर्शन पर किसका प्रभाव था?
उत्तर: इमैनुएल कांट, फिख्ते, स्पिनोज़ा
प्रश्न 14. मार्क्स ने हीगल की किस अवधारणा को अपनाया?
उत्तर: द्वंद्वात्मक पद्धति
(लेकिन उसे भौतिकवादी रूप दिया)
प्रश्न 15 .“जो वास्तविक है वही तर्कसंगत है” — यह कथन किसका है?
उत्तर: हीगल का।
प्रश्न 16. हीगल की प्रमुख रचनाएँ
उत्तर: Phenomenology of Spirit (1807)
Science of Logic
Philosophy of Right
Philosophy of History
प्रश्न 17: हीगल के अनुसार इतिहास का उद्देश्य क्या है?
A) आर्थिक विकास
B) धार्मिक उन्नति
C) स्वतंत्रता की चेतना
D) राजनीतिक शक्ति
✅ सही उत्तर: C
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